कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।

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संगीत पार्टी (काव्य)     
Author:सुषम बेदी

तबले पर कहरवा बज रहा था। सुनीता एक चुस्त-सा फिल्मी गीत गा रही थी। आवाज़ मधुर थी पर मँजाव नहीं था। सो बीच-बीच में कभी ताल की गलती हो जाती तो कभी सुर ठीक न लगता।

फिर भी जब गाना ख़त्म हुआ तो सबने खूब तालियाँ बजाई और अचला ने तो तारीफ़ में कहा कि बिल्कुल लता की तरह गाती है। अचला सभी गाने वालों को कोई न कोई नाम ज़रूर दे डालती थी। इससे गानेवाले सचमुच अपने आप को उस गायक के समान मान कर खुश हो जाते थे। फिर अगली पार्टी के लिए उसी फिल्मी गायक का कोई और गाना तैयार कर लेते। इस तरह हर दूसरे हफ्ते होने वाली इस संगीत महफिल में सभी की कोई न कोई उम्दा पहचान बनाती जा रही थी। समीर किशोर कुमार था, जमीला आशा भोसले, सुदेशराज मुकेश था, पवनकुमार मुहम्मद रफी, तथा अमृत सेठी तलत महमूद।

अपने इस दायरे में चूँकि सबकी कोई न कोई हस्ती बनी हुई थी सो शनिवार की शाम को देर तक होने वाली इस पार्टी के बूते उनका पूरा हफ्ता मज़े में कट जाता। कुछ लोग बाकायदा रियाज़ करते। जैसे सब को एक मकसद-सा मिल गया था।


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इस बार पार्टी अचला के घर पर थी। दरअसल अचला इन पार्टियों की ख़ास जान थी। वहीं सबसे फोन कर-कर के पार्टी में आने के लिए इसरार करती और इस तरह के फ़ैसले भी करती कि अगली पार्टी कहाँ, किसके घर होनी चाहिए और कौन क्या बना कर लाएगा। देर तक वह इन लोगों से फोन पर बात करती पर सिवाय पार्टी का समय-स्थान मुकर्रर करने के और कोई ख़ास बात न होती।

पति से अलग होने के बाद से अचला का अपना कोई सामाजिक दायरा रहा नहीं था। तब सारा रख-रखाव विवाहित जोड़ों के साथ ही होता था। पति से अलग होते ही जैसे उस पूरे समाज से वह कट गई थी। न केवल वे जोड़े ही अचला से कन्नी काटने लगे थे, वह खुद भी उनके बीच अटपटा महसूस करती थी। उन जोड़ों का पुरुष वर्ग या तो उसे कोई उपलब्ध वस्तु मानने लगा था या फिर वे उसे कोई अनुचित प्रकार का प्रभाव मानकर अपनी पत्नियों से दूर रखना चाहते थे। दूसरी और महिलाओं के लिए वह एक कौतूहल की चीज़ बन गई थी और उनके अपनी दबी इच्छाओं से सुलगते सवालों को सुन-सुन कर अचला के कान पकने को आ गए थे। फिर उस समाज के साथ बनाए रखने का मतलब यह भी था कि पति की उपस्थिति से वह कभी मुक्त नहीं हो सकती थी।

अब वह अपनी मर्ज़ी से गढ़ रही थी अपना समाज। ऐसा समाज जो अचला को ज्यों का त्यों स्वीकार करें। उस पर अपने नियम न लादे, अपनी माँगों का बोझ न डाले। हिंदुस्तानियों के इलावा पाकिस्तानी, बंगलादेशी, गयानी, विविध तरह के लोग थे उसके इस समाज में। ये सभी हिंदी फ़िल्म संगीत का ख़ास शौक रखते थे, सुनने के साथ-साथ गाने का भी। अचला ही इस समाज की मैनेजर थी, उसकी नेता और संस्थापक। वही इसके नियम बनाती थी और उन्हें कार्यान्वित करती थी।

अचला को खुद गाने का बहुत शौक था। कभी उसने सिनेतारिका बनने के सपने देखे थे अब सिनेमा के गानों से ही दिल बहला लेती थी। यों गाती तो वह बहुत मामूली थी। बल्कि लगभग बेसुरा ही गाती पर इस महफ़िल में फिर भी उसे सुनने वाले मिल जाते जो यह भी कह देते कि ''आज तो आपने पहले से बहुत अच्छा गाया है'' और अचला को तसल्ली हो जाती कि वह अब बेहतर गाने लगी है और अगली पार्टी के लिए वह किसी न किसी नए गाने का खूब रियाज़ करती। उसने एक बिजली का बाज़ा ख़रीद रखा था जिसमें लगभग उन सभी पुराने फ़िल्मी गीतों की धुनें उसने भरवा रखी थी जिनको वह गाना जानती थी।

लोग उसके गाने को पसंद करे या न पर उसका व्यक्तित्व खूब प्रभावशाली था। पाँच फूट छह इंच कद। गोरा रंग। खूब मक्खन-सी मुलायम त्वचा। नए फैशन के चटक रंगों के कामदार सलवार-कुरते पहन कर पैंतालीस की उम्र में भी वह तीस-पैंतीस से ज़्यादा की नहीं लगती थी। तभी तो पति इतना ईष्यालु और भयभीत था कि हर वक्त उसे बाँधे ही रखना चाहता था। पर अचला बाँधे जाने पर और भी कसमसाती और रस्सा तुड़ाकर भागने की कोशिश करती। बेटा पैदा होने के कुछ दिन बाद ही उसने पति से कहा था, ''मैं तो बोर हो गई घर में पड़े-पड़े। फ़िल्म दिखाने ले चलो न।'' सास ने इस बात पर खूब बुरा-भला सुनाया। तब अचला कसमसाती रही, और गुस्सा उस नन्हीं जान पर निकालती रही। कभी उसे अपने दूध से वंचित करके, तो कभी अपने आप से। सास कुढ़ती और पोत को अपने अंक में समेट लेती। कुछ बरस बाद अचला सास से रस्सा तुड़ाकर पति के साथ अमरिका पहुँच गई थी।

यहाँ उसे कोई रोकने-टोकने वाला तो था नहीं। मन होता तो घर पर रहती या फिर निकल जाती। बेटा किसी तरह बड़ा हो ही गया। एक बेटी भी हुई जिसे पालने में बेटे की मदद भी खूब रही। बेटी के होने तक अचला बच्चों की आदी भी हो चुकी थी इसलिए बेटी को माँ की सास के प्रति खीझ उस तरह से नहीं सहनी पड़ी जैसे उसके भाई को। लेकिन पति की शिकायतें दिन-ब-दिन बढ़ती ही रही।

खूब खुली तबियत की थी अचला। आराम से खुलकर चुहल करना, या मर्दों की ठरक का ऐसा मीठा जवाब देना जिसमें न स्वीकार हो न अस्वीकार, न बीवी को चोट पहुँचे न मियाँ को, यह सब सलीका उसे खूब आता था। अकेली जो रहती थी। सलीका न होता तो रोज़-रोज़ मिलने वाले मर्दों से कैसी निभाती। फिर हर किसी मर्द को अपने करीब तो आने दिया जा नहीं सकता। गुस्सा दिखाओ तो भी जल्दी भाग जाते है वे। सो कोई ऐसा ही तरीका अचला ने ईजाद किया था जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। मर्द उसके ईद-गिर्द मक्खियों की तरह भिनभिनाते थे पर पास जाकर छूने-छेड़ने की हिम्मत किसी की नहीं थी।

यों यह बात नहीं कि कोई ऐसी छुईमुई थी कि पास आने से या छूने से मुरझा जाती। पर छूनेवाला या पास आनेवालों को वह इन पार्टियों से दूर ही रखती थी। उनका वक्त और जगह अलग थी। वह उसके इस समाज का हिस्सा नहीं थे। न ही उनकी रुचि उसके इस समाज में थी। उनके साथ एक दूसरी दुनिया बसती थी, अलग समाँ बँधता था, और अपने अंधेरे-उजालों के साथ वह दुनिया उसके भीतर ही कही सिमटी रहती थी। अगर गलती से कोई इस दुनिया में आ भी टपकता तो उतना फ़र्क नहीं पड़ता था क्योंकि उसका किसी भी रूप में परिचय कराया जा सकता था म़ित्र-जन, सहयोगी। किसके पास फुरसत थी रिश्ते की तह में जाने की! एक बार आपसी हालचाल बाँटने के बाद पूरी शाम गाने-बजाने में ही तो निकलती। अगर कोई गाना न सुन गप मारने भी लगता तो दूसरे उन्हें घूर कर चुप करा देते। मतलब होता कि आखिर जब गाना सुनने के लिए बुलाया गया है तो ठीक से सुनिए वर्ना जब आपकी गाने की बारी आएगी तो हम भी गप मारने लगेंगे। इस तरह एक दूसरे का लिहाज करते हुए सब घंटो सुनते ही रहते थे एक दूसरे का गाना। बात यह है कि अपने गाने को यह सब लोग बड़ी गंभीरता से लेते थे। नौकरी-धंधे की खुश्क दुनिया को वह यहीं से रस पाकर सींचते थे।

अचला की भी और एक दुनिया थी। उसके दफ्तर की। जहाँ वह एक बैंक मैनेजर थी। यों इस दफ्तर तक, ख़ास तौर से इस पद तक पहुँचने के लिए ज़रूर उसे एक तीसरी दुनिया के नुमाइंदे की मदद लेनी पड़ी थी। पर वह नुमाइंदा बैंक की चारदीवारी में कभी कदम नहीं रखता था। उसकी हस्ती अदृश्य ही बनी रहती थी। शायद इसीलिए इस वक्त जबकि उसके बैंक में खूब खलबली मची हुई थी, वह प्रगट नहीं हो पा रहा था।

जब से वह इस बैंक में आई थी, उस पर एकदम से काम का खूब बोझ डाल दिया गया था। बैंक के वाईस प्रेसिडेंट ने अपने दोस्त की सिफ़ारिश पर अचला को नौकरी भी इसलिए दी थी कि ऐसे प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली महिला अपने रौब से इन सारे बहुसंस्कृति वाले कर्मचारियों से काम ले पाएगी। बैंक में पैसा बचाने का दौर चल रहा था। इससे कुछेक कर्मचारियों को निकाल दिया गया था। अचला को ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी कि किसी तरह वह इन बचे हुए कर्मचारियों से ज़्यादा से ज़्यादा काम ले ताकि पहले से कम लोग होने पर भी बैंक का काम ढीला न हो।

अचला पूरे जीजान से इस काम में लग गई। उसने देखा कि बैंक के सारे कर्मचारी मूलत: सुस्त थे और काम करने में उनकी कतई रुचि न थी। इसीसे बैंक घाटे में जा रहा था। उसने बैंक के वाईस प्रेसिडेंट से सलाह करके कुछ नए नियम बनाए और उन्हें लागू करने लगी। उसने देखा सब काम पर देरी से आते थे और रजिस्टर में वक्त वही भरते थे जो कि काम पर आने का नियमित समय था। इसी तरह लंच एक घंटे का मिलता था। सब रजिस्टर में एक घंटा ही दर्ज करते जबकि दो-दो घंटे बाद लंच से वापस आते। सब चूँकि ऐसा करते थे इसलिए उनकी मिलीभगत थी। कोई एक दूसरे की शिकायत न करता था।

ऊपर से यों सब बहुत विनीत थे। जो भी अचला कहती वे सुन लेते। बड़ी मुलायमियत से सहमति जताते। ये और बात थी कि करते वही जो खुद चाहते। अचला बहुत कम जान पाती थी कि उनके भीतर क्या-कुछ चल रहा है। चूँकि उसका बाहरी व्यक्तित्व इतना रौबीला, आकर्षक और प्रभावशाली था, बहुत से लोग उसकी सामर्थ्य को कुछ ज़्यादा ही आँक बैठते थे और अकसर उसे इससे लाभ ही मिलता था।

अचला के लिए रोज़-रोज़ सबके आने जाने के वक्त पर निगाह रखना मुश्किल था। कुछ दिन तो वह यही सब करती रही। पर इससे मैनेजमेंट के दूसरे देखभाल के कामों में ढील पड़ने लगी।

बैंक कर्मचारियों में एक क्लर्क हिंदुस्तानी भी थी। नाम था भारती। भारती उसे बड़ी जिज्ञासा से टोहती रहती थी। बात होने पर पता लगा कि दोनों एक ही कॉलेज की पढ़ी थी। भारती उम्र में कुछ कम थी पर अचला उससे कहीं ज़्यादा जवान या छोटी लगती थी। अचला ने भारती की आँखों में पढ़ डाला था एक चुपके से उभरती ईर्ष्या को कि कहाँ तो अचला बैक मैनेजर और कहाँ भारती अदना सी क्लर्क। फिर भी दोनों की बात शुरू होती तो होती ही जाती जबकि अचला को अपने मैनेजर होने का या भारती को अपने क्लर्क होने का ख़याल कभी न भूलती। अचला को भारती से बात कर बड़ी तसल्ली मिलती कि एक जन तो यहाँ है जिसे वह पहचानती है और शायद उसके माध्यम से कुछ और भी समझ हाथ लगे।

अचला ने एक दिन उसे कह ही दिया कि क्यों न वे दोनों एक दिन लंच साथ करें। भारती तो फूल कर कुप्पा थी। कहाँ तो बैंक मैनेजर कभी उसके होने से भी वाकिफ़ न थे और यह वाली मैनेजर तो उसे लंच के लिए बुला रही है।

अचला जो भी भारती से कहती वह उल्टे अपने-आप को महत्वपूर्ण मानकर खूब खुशी से पूरा करती। धीरे-धीरे कौन कितने बजे आता है और कितने बजे का रजिस्टर में हस्ताक्षर करता है इस सब की सूचना भारती ही अचला तक पहुँचाने लगी। भारती से अचला मित्र की तरह व्यवहार करने लगी थी इसीसे जो भी अचला कहती वह उसमें कोई उज्र न समझती। यहाँ तक कि भारती रोज़ घर से ही खाना बना कर लाने लगी और दोनों अचला के ही कमरे में साथ बैठकर खाना खाने लगी। अचला इस खाने के घंटे का बड़ी बेताबी से इंतज़ार करती जैसे कि किसी बच्चे को नए मिलनेवाले खिलौने से खेलने का इंतज़ार रहता है। इसी खाना खाने के वक्त ही भारती दफ्तर के फ्लोर पर होने वाली सारी बातें अचला का सुना जाती।

अचला को जैसी जिज्ञासा भारती से दफ्तर के कर्मचारियों के बारे में होती थी भारती को वैसी ही जिज्ञासा अचला के व्यक्तित्व को लेकर। वह ढेरों सवाल पूछती प़ति, परिवार, बच्चे, नौकरी कैसे मिली।

अचला जवाब देती। आखिर कुछ तो कीमत उसे भी चुकानी ही थी भारती की सूचनाओं की। पर अपने बारे में वह खबर देती पूरे सेंसर के साथ। फिर भी उसने इतना तो भारती को बता ही दिया था कि पति से उसका तलाक़ हो चुका है। दो बच्चे हैं, एक बेटी और एक बेटा। बेटी पढ़ती और नोकरी करती है। अलग रहती है। बेटा पहले बाप के साथ रहता था अब नौकरी के बाद वह भी अलग शहर में रहने लगा है। पति कुछ बीमार रहता है इसलिए जल्दी रिटायर होकर अपने घर में ही रहता है। अचला खुद अलग अपार्टमेंट लेकर रहती है।

साथ ही अचला ने मन में सोचा था कि इस महिला को वह अपने घर पर कभी नहीं बुलाएगी। जबकि भारतीने उसे बताया था कि वह भी अच्छा गा लेती है।

हर किसी के पास सूचनाओं के टुकड़े ही थे। अगर घर और बाहर के लोग साथ मिल कर बैठ जाए तो टुकड़े जुड़कर एक तस्वीर भी बन सकती थी। अचला को लगता कि क्यों वह तस्वीर बनाने का मौका दे। यों ही टुकडों में अधूरापन या गुप्त-रहस्यमय सा कुछ बना रहे तो शायद वह बची रहेगी।

बस इतना ही तो चाहिए था उसे। खुद को दूसरों की अपेक्षाओं से बचाकर अपने ढंग से अपनी ज़िंदगी गढ़ना। विवाहित रहते हुए कितना असंभव था अपनी मरज़ी से जीना। हर रोज़, हर छोटी-छोटी आज़ादी के लिए जंग करना पड़ता था। अब अपनी ज़िंदगी और अपने समाज की नियामक वह खुद है!


आज की महफ़िल में अचला की बेटी नीली भी शामिल थी। यों तो नीली माँ से बहुत अलग किस्म की लड़की थी। उसे न तो हिंदुस्तानी संगीत की समझ थी न रुचि। फिर भी चूँकि पार्टी आज अचला के यहाँ थी इसलिए वह और उसका ब्वायफ्रेंड वहाँ आए हुए थे ममा की मदद करने। नीली को जिस कंपनी में नौकरी मिली थी यह लड़का भी वही काम करता था। नीली उसे पसंद थी और अचला को वह लड़का नीली के लिए ख़ास तौर से इसलिए पसंद था कि बहुत शरीफ लड़का था और जो कुछ भी नीली कहती वह उसे करने को तैयार रहता था। जैसे कि अभी उसके कहने से वह उसकी माँ की मदद करने इस गाने-बजाने की महफ़िल में आ गया था। न उसने कुछ सुना, न किसी मेहमान से बात की। बस नीली के पीछे-पीछे लगा काम करता रहा। कभी ग्लास उठाने, तो कभी ड्रिंक सर्व करने, तो कभी खाना लगाने के तरह-तरह के काम बेचारा नीली को खुश करने के लिए, जो कोई भी कुछ कहता, बिना चूँ किए कर देता।

नीली और उसके दोस्त एरिक, दोनों को ही अचला पसंद थी। नीली ममा की शुक्रगुज़ार थी कि उन्होंने उसे खुली छूट दे रखी थी साथ ही वह खुद भी ममा की अपनी आज़ादी के हक में थी और तलाक के वक्त उसने पापा के बजाय ममा का ही साथ दिया था। ममा के व्यक्तित्व की ज़रूरतों के प्रति नीली के मन में हमदर्दी थी। न्यूयार्क में पली-बढ़ी नीली तो खुले आम यह महसूस करती और कहती थी कि पापा का बस चलता तो माँ बेटी दोनों को ही ताले में बंद कर के धर देते।

खाना लगने की देर थी कि गाना बजाना भूल सब खाने की मेज़ के आसपास आकर इकठ्ठे हो गए। कितने किस्म की तो चीज़ें बनी थी। अचला ने खुद चाट और रसमलाई बनाई थी। बाकी सब लोग कुछ न कुछ बनाकर साथ लाये थे म़ुर्ग मखनी, कीमा मटर, गोभी-आलू, बिरयानी, पराठे वगैरह-वगैरह।

यों अचला ने तो सोचा था कि आज का सारा खाना वह खुद ही बनाएगी क्योंकि वह अपने बेटे की शादी की पार्टी करना चाहती थी पर शरीर में वैसा उल्लास और उर्जा नहीं ला पायी थी सो उसने सोचा कि वह अकेली क्या बनाएगी, जैसे सब मिल कर बनाते हैं इस बार भी वैसा ही चलने दो। एक तरफ़ उसे लगता रहा कि उसे परवाह नहीं कि पार्टी हो या न, आखिर बेटा तो उसके साथ है नहीं। दूसरी तरफ़ भीतर कहीं उठता रहता कि बेटे की शादी का शगन तो कर ही लेना चाहिए! फिर संगीत पार्टी भी शादी के ईदगिर्द उसी के यहाँ पड़ रही थी, दोनों काम आराम से साथ-साथ हो सकते थे। पर आज मन बुझा-बुझा-सा था।

यों भी दफ्तर में जो नियम लागू करने में समय और ताक़त लगती थी उससे वह मानसिक तौर पर बड़ी थक जाती थी। भारती की सूचनाओं का फ़ायदा काफी हुआ था और इससे वह दफ्तर में कड़ा अनुशासन रखने में भी सफल हो गई थी। दो एक बार तो उसने कर्मचारियों को रंगे हाथों झूठा वक्त भरते पकड़ लिया था। वाईस प्रेसिडेंट ने तो कहा कि वह उनके खिलाफ़ फाइल तैयार करे ताकि इस तरह उनको बैंक से निकाला जा सके।

यों अचला को खुद इन लोगों से कोई लेना-देना नहीं था, दूसरे की नौकरी छीनने का ज़िम्मेदार बनने में उसे झिझक होती थी, पर अपनी नौकरी को बरकरार रखने के लिए उसे यह सब करना ही था।

बैंक में उस के अधीन लोग अब उसे संदेह की निगाह से ही देखने लगे थे और भारती के सिवा और किसी भी मातहत से उसकी खुली बात न होती थी। पर साथ ही मन में इस ताक़त का उसे सुख भी मिलता था। ख़ास तौर से भारती तो उसकी इस समर्थन से बेहद प्रभावित थी और उसे और भी ज़्यादा दफ्तर की गप्पे सुना डालती थी।

यों भारती का कौतूहली मन अचला के करीब आने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था पर साथ ही अपनी दी सूचनाओं की ऐवज में यह भी जानना चाहता था कि अचला की निजी ज़िंदगी किन तत्वों से बनी है, दूसरे पुरुषों की क्या जगह है वहाँ, आखिर अचला तो तलाकशुदा है, सो क्या अचला दूसरे पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध रखती है?

अचला ने बड़े आराम से कह दिया था, उसमें क्या है? क्या भारती नहीं रखती? आखिर चालीस-पैंतालीस की उम्र में आते-आते तक कोई न कोई दूसरे पुरुष ज़िंदगी में आ ही जाते हैं।

अचला को अचंभा हुआ था जब भारती ने उसे कहा था कि अपने पति के सिवाय उसने कभी किसी पुरुष को खुद को छूने भी नहीं दिया। तब अचला ने यह भी सोचा कि भारती में सच कहने की हिम्मत भी नहीं होगी। आम हिन्दुस्तानी औरते ऐसी बातें किसी से नहीं कहती। भारत में रहते हुए अचला भी शायद न कहती। पर इतने सालों से यहाँ रहते वह इस मामले में खुल गई है क्योंकि उस की अमरीकी सहेलियाँ खुलकर अपने पुरुष मित्रों के बारे में बात कर लेती है।

पर कह देने के बाद अचला पछतायी थी क्योंकि भारती अपने हावभावों से कही उसे यह सुना गई थी कि अगर वह बैंक मैनेजर है तो सिर्फ़ इसी वजह से। वर्ना भारती और अचला में सच में कोई फर्क़ नहीं। दूसरी तरफ़ अचला को यह भी लगता कि भारती जैसी दकियानूसी औरते वही हिंदुस्तानी नारी की पवित्रता की लीक को पकड़े न कभी खुद आगे बढ़ेगी न दूसरों को बढ़ने देगी।

शायद उसकी मानसिक थकान की वजह यह भी रही होगी।
भारती उसके भीतर के एक ऐसे अंश को छेड़ जाती थी जो अभी भी हमेशा दुखता रहता था और वह था अचला का अपने परिवार और ख़ास तौर से अपने पति और बेटे के साथ संबंध।

अचला ने अपने पति को खुद छोड़ा था। पर जिस तरह की बंदिशे उसके पति ने उस पर लगा रखी थी, अचला का तो जीना मुहाल था। कभी रात को देर से आओ तो सवाल-जवाब। कभी कहीं बाहर जाओ तो डाँट-फटकार। पति चाहता था कि अचला बस उसकी और उसके घर की बनी रहे। अचला को अपना-आप भी चाहिए हो सकता है यह बात उसकी समझ में नहीं आती थी।

वह बार-बार उसे नहीं सुनाता रहता, ''तू अब वैसी नहीं रही। यहाँ आकर बहुत बदल गई है।''
अचला चिढ़ जाती, ''वट डू यू मीन? मैं अभी भी वहीं हूँ। बस वहाँ कुछ करने का मौका नहीं मिलता था, न टाईम होता था। यहाँ फ़ुरसत भी है और मौका भी।''


3

घर की बंदिशे अचला की बर्दाश्त से बाहर थी ऱोज-रोज वही दिनचर्या, उब, एकरसता, बेचैनी। तभी अचला ने एक दिन नौकरी करने का फैसला कर लिया था। बस नौकरी के बहाने बाहर निकलती तो पति का सामना करने से बचने के लिए और भी देर से घर लौटती। रोज़-रोज़ तक्रार शुरू हो गई। पति बोला नौकरी करने की ज़रूरत नहीं। घर पर बैठो और बच्चों की देखभाल करो।

पर बच्चे तो बड़े हो चुके थे। देखभाल का मतलब था दिन भर उनका इंतज़ार, चिढ़न और कुढ़न। आखिर अचला ने घर और बच्चों सभी को एक साथ छोड़ दिया। अब अचला की अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी थी पर भारती जैसे लोग उसे बार-बार अपने अतीत की ओर खींचने लगते। यों यहाँ की ज़िंदगी में भारती जैसे लोग एकदम फालतू थे, उनसे रखे-रखाये बिना भी आराम से काम चलाया जा सकता था। आखिर ये लोग उसके वर्तमान जीवन में कोई भी अहम भूमिका अदा नहीं करते। बस एक नास्टेल्जिया-सा ही तो है भारती का साथ! जब चाहे उसे झटका जा सकता है। हमेशा के लिए तो उस नास्टेल्जिया में बहा भी नहीं जा सकता। पर भारती को वह चाहे कितना दोष देती रहे ज‍ख्म को छेड़ देने के लिए। ज़ख्म तो उसका अपना ही है।

पति को छोड़कर एक बेहतर ज़िंदगी की सोची थी। पर कोई भी तो पुरुष ऐसा नहीं मिला जो उसके लिए सही हो। जिससे मन भी मिले और उसकी अपनी माँगे भी वह पूरी कर सके। ऐसा पुरुष जो उसे मुक्ति भी दे सके और प्यार भी। उसके पहले पति की तरह, उसकी हर हरकत, उसकी हर चालढाल को मात्र संदेह से ही न देखता रहे।

वह सुंदर है इसलिए वह किसी एक से प्यार नहीं कर सकती, यह मानना कितना गलत है। यह सच है कि उसे पुरुषों का अपने प्रति आकर्षण सुख देता है और वह उन्हें इससे हटाना नहीं चाहती, पर वह उनके प्रति समर्पित भी नहीं होना चाहती। अगर समर्पित होना है तो उस किसी विशेष के प्रति ही होगी। हर किसी के प्रति तो नहीं। क्या कोई भी पुरुष उसके मन की इस स्थिति को समझकर उसे अपना बना सकेगा? उसे प्यार दे-ले सकेगा!

पर जब भी कोई पुरुष उसके निकट आया, उसे संदेह की निगाह से ही देखता। अचला का अपना मन हिंदुस्तानी पुरुषों से ही मिलता था और उसे मुक्ति के साथ प्यार देने वाला कोई भी पुरुष नहीं मिला। यह बात नहीं कि वह एक से अधिक पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध बना कर रखना चाहती थी, पर मूल रूप से मुक्ति की माँग ज़रूर करती थी कि किसी की संपत्ति बन कर नहीं रहना है उसे। शायद इसीसे पति से तलाक के बाद से ज्यों-ज्यों वक्त गुज़रता जा रहा था, उसकी किसी सही पुरुष से मिल पाने की उम्मीद धुंधली पड़ती जा रही थी और अकेले रह जाना उसकी ज़िंदगी की सच्चाई बनती जा रही थी।

खाना खाके सब फिर से गाना गाने बैठ गए थे। सब कह रहे थे कि अब अचला की बारी है। उसे एक गाना तो गा ही लेना चाहिए।
अचला का मन भरा-सा था। उसने बहुत दर्दभरा एक पुराना फिल्मी गीत गाया। किसी ने गौर नहीं किया उसकी आँखें सच में भरी हुई थीं। सबने कहा, ''आज तो वाकई में अचला ने बहुत ज़ोरदार गाया है।''

अचला का मन हो रहा था अब सब चले जाए। इनमें से किसी को नहीं मालूम था कि उस पर आज क्या बीत रही थी। उसका खुलापन, हँसी-मज़ाक, उत्साह से गले मिलना या गाल पर चूमना, यही तक का तो नाता था इन सब से। इससे ज़्यादा न वह खुद आगे बढ़ती थी न दूसरे! बेटे की शादी का जो भी मतलब इस या उस या किसी भी समाज में हो, अचला के लिए तो वह एक ज़ख्म बनता जा रहा था और वह यह ज़ख्म किसी को भी दिखाने की हिम्मत नहीं रखती थी।

इधर दफ्तर में हालात बिगड़ गए थे। सब कर्मचारियों को अंदाज़ा हो गया था की भारती ही उनके खिलाफ़ अचला के कान भरती है। उन्होंने आपस में मिलकर मीटिंग की जिसमें भारती को बाहर रखा गया और इस मीटिंग में अचला के खिलाफ वाईस प्रसिडेंट को खत लिखा गया कि वह उन्हें स्कूल के बच्चों की तरह अनुशासित करना चाहती है। उन पर देर से आने के झूठे इल्ज़ाम लगाए गए हैं। दफ्तर का माहौल काम करने लायक नहीं रहा। उनका ऐसे कड़े अनावश्यक अनुशासन में दम घुटता है। इस बारे में कुछ किया जाए। वर्ना वे सब मिल कर यूनियन तक अपनी शिकायतें ले जाएँगे और आखिरी दम तक लड़ेंगे।

वाईस प्रेसिडेंट ने खत दिखाते हुए अचला से इस बारे में बातचीत की थी और हल ढूँढ़ने की हिदायत दी थी। उसका कहना था, ''मुझे नहीं पता था कि तुम इस तरह के सख्त नियम लागू कर रही हो। मैं इस मामेले में कुछ नहीं कर सकता। तुमको ही कुछ न कुछ हल खोजना होगा वर्ना तुम्हें त्यागपत्र देना पड़ सकता है। कुछ सोच समझ लो फिर मुझसे डिस्कस करना।''

अचला ने तो सोचा था कि ऐसे ऊँचे स्तर की नौकरी मिल गई है तो उसकी ज़िंदगी सुधर गई। दब कर काम करेगी और शामों को मज़े करेगी। पर यह नौकरी तो मुश्किल से साल भी नहीं गुज़ार पाई। अब फिर से कहाँ खोजेगी काम? इतनी मुश्किल से तो यह नौकरी मिली थी। कहाँ से देगी अपार्टमेंट का किराया? और रोज़मर्रा के खर्चे?
पर अचला का कष्ट शायद इतना ही नहीं था।
उसके भीतर लगातार एक संवाद चला जा रहा था।
गानों के बीच वक्फा पड़ा तो वह फिर से यह संवाद सुनने लगी थी, ''अरे हमें तो पता ही नहीं था कि आपका बेटा भी है! कितना बड़ा है।''
''आप तो इतनी यंग लगती है। हम सोच ही नहीं सकते कि आपका शादी लायक बेटा भी है। क्या सच में आपका अपना ही है!''
''अपना नहीं होगा तभी तो शादी में गई नहीं।''

''सच! बेटे की शादी पर आप नहीं गईं?''

और अचला उन अदृश्य आवाजों को जवाब देती रही, ''क्या करूँ! छुट्टी ही नहीं मिली। तभी तो आज उसी के लिए पार्टी कर रही हूँ।''

''बेटा बहू कहाँ हैं?''

''वे लोग भारत से ही सीधे हवाई गए हैं, हनीमून के लिए।''

यों शादी पर नीली भी नहीं गई थी। पर नीली का कहना था कि अगर ममी नहीं जाएगी तो वह भी नहीं जाएगी। यों भी इसे अपने हिंदुस्तानी रिश्तेदारों के गोलमोल सवालों का जवाब देने में बहुत तकलीफ़ होती थी। उसे कभी पता नहीं चलता था कि वह सही कर रही है या गलत। वह जो भी कहती, उसके मतलब से अलग अर्थ तो लगाए ही जाते थे क्योंकि बाद में उसे ममी या पापा से यह ज़रूर सुनना पड़ता था, ''नीली ऐसे नहीं कहते।'' ''ठीक है तुम्हारा मतलब यह ज़रूर रहा होगा पर यहाँ पर इस तरह नहीं कहा जाता।''

और अचला यह किसी से नहीं कह पाएगी कि उस के बेटे ने संदेस भिजवाया था कि उसकी माँ शादी पर नहीं जाएगी। अगर माँ गई तो वह शादी करेगा ही नहीं। वह नहीं चाहता कि ''उसकी पत्नी पर उसकी माँ का साया पड़े'' और ये शब्द अंदर ही अंदर खाये जा रहे थे अचला को।

यह सच था कि बेटे को इस बात पर आपत्ति थी कि ममा पापा को छोड़ रही है। उसका यह भी कहना था कि पापा तो बीमार रहते हैं इसलिए ममा उनकी देखभाल नहीं करेगी तो और कौन करेगा। उसने ममा को यह धमकी भी दी थी कि ममा ने पापा को छोड़ दिया तो वह कभी उनसे बात नहीं करेगा।

कभी कभार बात फिर भी हो जाती थी। पर वह कहता रहता कि ममा स्वार्थी है। उन्हें पापा से ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए आखिर वे उनके पति है। रिश्तों में इस तरह से मनमानी करना ममा को शोभा नहीं देता। वे जानती है कि पापा तो उन्हीं पर निर्भर करते हैं। दिल के मरीज़ है। किसी न किसी को तो पास होना चाहिए। ये नहीं सोचती कि वे कितने अकेले रह जाएँगे?

शादी ब्याह के मामले में तो गिले-शिकवे ख़त्म हो जाते हैं। पर यहाँ तो वह गाँठ ही डाल कर बैठ गया है।

किस ने सिखा-पढ़ा दिया ऐसा? द़ादी ने, या बाप ने! ऐसी अवमानना। ऐसा प्रहार! इतनी बड़ी सज़ा!

पता नहीं क्या कुछ कहा होगा अचला के खिलाफ़! वर्ना इस तरह से माँ का अस्वीकार! क्या उसको माँ की ज़रूरत महसूस नहीं हुई होगी! क्या सच में माँ को तिरस्कृत करके वह चैन से बैठा रह सकता है!

क्या नयी पत्नी माँ के स्थान को इतना भर देगी कि माँ को देखने तक की ज़रूरत नहीं महसूस होगी! भूल जाएगा माँ को!

दुनिया भर के रिश्तेदार तो इकठ्ठे हुए उसकी शादी में। बस एक माँ ही ज़िसे कि सबसे पहले, सबके आगे, सबके उपर होना चाहिए था!

क्या कभी नहीं मिल पाएगी अचला अपने बेटे-बहू से!

सच में इतनी बुरी है वह, माँ का साया नहीं पड़ने देगा पत्नी पर!
क्या सच में ये उसी के शब्द हो सकते हैं!

अचला का मन किसी छीजे हुए पुराने कपड़े-सा हो रहा था। ज़रा-सा भी तानो तो फटता जाता था।

नीली माँ की पीड़ा को समझती थी और बस नीली ही समझती थी। सिर्फ़ उसी ने ममा का घुटना और तड़पड़ाना देखा था। बचपन से देखती आ रही थी। पापा की माँगों का तो कभी अंत ही नहीं था। भईया भी तो बिल्कुल पापा के जैसा। ममा को तो जैसे घर का नौकर बना कर रखा हुआ था। बस इनकी ज़रूरते पूरी करते रहो, इनके आगे-पीछे घूमते रहो। अगर न घूमो तो बस स्वार्थी है। जैसे कि हमारा तो जन्म ही इनकी देखभाल के लिए हुआ है। बस एक ममा ही थी जो नीली को पापा और भईया के नाजायज़ फ़ायदा उठाने से बचाती थी। ममा ज़ोर देती कि बेटी और बेटे की परवरिश में फ़र्क नहीं करेगी। पर पापा और दादी से इस बात पर बार-बार लड़ाई हो जाती। बस यही सुनाया जाता कि लड़की बिगड़ रही है। ममा बिगाड़ रही है!

जमीला ने एक पुराना फिल्मी गाना शुरू किया -

''मेरे बन्ने की बात न पूछो, मेरा बन्ना हरियाला है
मेरे बन्ने के रूप के दम से चारों तरफ़ उजियाला है।''

अचला को अचानक किसी ने ढोल-बैंड से लदी-सजी बारात में पहुँचा दिया था। घोड़ी पर बैठा उसका इकलौता बेटा! सेहरे के फूलों से ढका कोमल पर मज़बूत चेहरा। सफ़ेद अचकन में राजकुमार जैसा। रिश्तेदार, दूर के नाते, पुरानी सहेलियाँ। नाच, गाने, गप्पे, मिठाइयाँ, पकवान और गिले शिकवे!

जमीला ने गाना बंद किया तो मानो अचला को फिर से ज़मीन पर लाकर पटक दिया। सहसा उसे अपनी छूटती हुई नौकरी का ख़याल आ गया।

अगर वह भारती को दफ्तर से निकाल दे तो शायद उसकी अपनी नौकरी बच सकती है। भारती को इतना करीब ले आना गलत बात थी। वाइस प्रेसिडेंट से इस बारे में बात करेगी।

पर बेचारी भारती!

तो अचला क्या करे? फिर से नयी नौकरी की तलाश?

नहीं! क्या जाने इस स्तर की नौकरी मिले या न?

महीना तो देखते-देखते गुज़र जाता है। कहाँ से लाएगी किराया हर महीने। कहीं से कुछ मिलने का आसरा नहीं।

भारती को तो क्लर्की कहीं भी मिल जाएगी। अचला मुस्कुरायी। पर उदासी मिटी नहीं थी।

ये सब लोग गाने गा कर चले जाएँगे।

क्या ये लोग भी इसी तरह जीते होंगे? आज नौकरी है तो कल नहीं। सब पर वही तलवार लटक रही है।

पर अचला खुद किसी के अंदरूनी मामलों के बारे में कुछ नहीं जानती। सब हँसते-खुश होते आते हैं, वैसे ही लौट जाते हैं। किसी के भीतर से तो उसका कोई सरोकार नहीं! न ही उसे अपने से इतनी फ़ुरसत मिलती है कि दूसरों के गरेबान में झाँक सके!

इनमें से भी कोई नहीं जानता कि अचला का भीतरी संसार कैसे चिरा जा रहा है।
यहाँ से छुट्टी हो गई तो शायद उसे भी कहीं क्लर्क की नौकरी ही मिले।
हर बार तो तुक्का नहीं लगता।

पर यह तुक्का उसके लाभ के लिए था या कि बैंक प्रेसिडेंट के। उल्लू तो वही बनी! पहले उसके हाथों दूसरों को निकलवाया, फिर उसी का पत्ता काटने की साज़िश! पर इतनी कच्ची गोलियाँ तो वह भी नहीं खेली। कुछ न कुछ जुगाड़ तो करना ही होगा।

तो कैसे बचाएगी खुद को।

खुद को बचाकर रखना अब भी उतना ही मुश्किल क्यों है? सिर्फ़ हमलावर ही बदले हैं!

क्या कहना होगा वाईस प्रेसिडेंट से। बहुत सोच समझ कर इस की तैयारी करनी होगी। अपने उसी मित्र की सलाह लेगी जिसने यह नौकरी दिलवायी थी।

अचला ने सारी योजना सफाई से समझा दी तो वाईस प्रेसिडेंट ने उसकी सूझ की दाद दी और कहा, ''अरे आपने तो बैंक की और भी बचत करा दी। मैं प्रेसिडेंट से आपकी तनखा बढ़ाने के लिए रिकमैंड करूँगा।''

अचला ने पल भर को चैन की सांस ली थी कि चलो उसकी नौकरी तो बच गई पर मन फिर भी उद्विग्न बना रहा।

अगले दिन ऑफिस में गई तो भारती उसके कमरे में आकर भभक पड़ी, ''क्या करूँगी मैं? कहाँ जाऊँगी। इन लोगों ने तो मुझे निकाल दिया है। सब ने कह दिया है कि वे ऐसे विश्वासघाती के साथ काम नहीं कर सकते। मेरी कान्फीडेंशल रिपोर्ट भी ख़राब कर दी है। मेरा भला क्या कुसूर है इसमें? मैं तो जो आप पूछेगी वही बताऊँगी। मैंने कोई जानबूझ कर किसी के खिलाफ़ आपके कान तो नहीं भरे।''

अचला चुपचाप भारती की बात सुनती रही।

''आप मेरा कुछ कीजिए। मैं तो फालतू मे मारी गई। देखिये मेरे पति के पास भी आजकल ठीक नौकरी नहीं है। बच्चे अलग पढ़ रहे हैं। प्लीज़!''

उसने भारती के आरोप से बचने के लिए कहा, ''मैं क्या करूँ? मेरी तो अपनी नौकरी को ही ख़तरा है।''

फिर बड़ा अपनापन जताते हुए बोली, ''इस दफ्तर में हमी दोनों हिंदुस्तानी है। इसीसे किसी को समझ नहीं आता हमसे कैसे पेश आए। सो डर के मारे अब हम दोनों की ही छुट्टी किए दे रहे हैं। खैर मैं बात करूँगी, पर मुझे उम्मीद नहीं कि मेरी सुनेंगे।''

अचला को भारती पर तरस भी आ रहा था। साथ ही ग्लानि भी कि वह उस को झूठा आश्वासन दे रही थी जबकि उस को नौकरी से निकलवाने की साजिश खुद अचला को ही करनी पड़ी थी। पर करती तो क्या! या तो उसे खुद निकलना पड़ता या भारती को वर्ना दफ्तर के दूसरे कर्मचारियों का विश्वास कैसे जीतती!

रात बहुत बीच चुकी थी। लोग गा-गा कर थक चुके थे। फिर भी उत्साह कम नहीं हुआ था इसलिए थके फटे गलों से मिलकर पुराने लोकप्रिय फिल्मी गीत समवेत स्वर में गा रहे थे, ''बचपन के दिन भी क्या दिन थे, उड़ते फिरते तितली बन के।''

अचला विद्रूप से मुस्कुरायी। उड़ती-फिरती तितली कितनी देर तक सुरक्षित रह पाती होगी! कोई न कोई झप्पट्टा मारेगा ही!

किसी ने कह दिया, ''अचला आज तुम्हारा जोश कहाँ चला गया। ये वाला तो मिल कर गाओ।''

फिर सब ने गाना शुरू कर दिया था, ''राजा की आएगा बारात, रंगीली होगी रात, मगन मैं नाचूँगी।'' गान चलता रहा। अचला बचपन, यौवन और अपने मौजूदा हालात के साथ गाने का अर्थ जोड़ती खामोश ही रही। शामिल नहीं हो पाई गाने में।

अचला उठकर रसोई में आकर बर्तनों का काम करने लगी। उससे गाया नहीं जा रहा था। नीली ने किसी से कहा, ''दो तो बज गए। मुझे तो सुबह काम पर जाना है।''

''इतवार को भी?''

''हाँ एक ख़ास प्रोजेक्ट चल रहा है।''

वह उठी तो पार्टी उखड़ गई। लोग उठने लगे।

अचला रसोई से निकल कर दरवाज़े पर आ कर खड़ी हो गई।

अगर वह किसी से शादी का ज़िक्र न ही करती तो शायद बेहतर होता!

पार्टी तो हो ही रही थी। उसे शादी के मौके से जोड़कर वह क्या हासिल करना चाहती थी? बेटे के प्रति अपने कर्तव्य का निभाए! या कि बेटे के नाम पर शादी का उत्सव करके उस की शादी में सम्मिलित होने की मन की उड़ान या मन की तसल्ली! कि उसने नहीं बुलाया तो न सही! पर माँ के हक से कोई शादी का उत्सव करने से तो रोक नहीं सकता!

यह सब उस बेटे के लिए जो इसलिए उससे तोड़ चुका है कि उसने अपने पति को क्यों छोड़ा?

या यह बेटे का दबा आक्रोश था और अचला की कोई दबी अपराध भावना थी। जिसके अनचाहे आगमन ने उसके यौवन को चारदीवारी में बाँधकर कसमसा दिया था, अब जब वह फूल बन कर महक उठा तो अचला भी अपनी फुलवारी पर गर्व से सर उठा कर ताकने लगी थी। पर उस फूल का मालिक अब कोई और बन बैठा था। अचला दूर खड़ी जैसे पराये माल को ललचायी आँखों से निहार रही थी।

लोग बेटे की शादी की बधाई दे-दे कर रुख़सत होने लगे थे। अचला उन्हें धन्यवाद भी करती जा रही थी पर मन ऐसे हो रहा था कि जैसे मसल-मसल कर किसी ने कूचे में फेंक दिया हो। उसकी सारी हस्ती ऐसा महसूस कर रही थी जैसे वह किनारे का कोई पेड़ हो जिसके आसपास से कितनी ही नदिया गुज़र जाती हो पर वह वैसे ही ठूँठ खड़ा हो। कोई भी पानी उसे नहीं छूता।

-सुषम बेदी

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