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मेरी बड़ाई | लघुकथा  (कथा-कहानी)     
Author:सुदर्शन | Sudershan

जिस दिन मैंने मोटरकार खरीदी और उसमें बैठकर गुज़रा, उस दिन मुझे ख्याल आया, "यह पैदल चलने वाले लोग बेहद छोटे हैं और मैं बहुत बड़ा हूँ।"

और जब शाम को मैं और मेरी बड़ाई घर आते तो हम दोनों खुश होते जो लाता जैसे हमारे चेहरे सीढ़ियों के अँधेरे में चमकते हों।

और जब हम सोफे पर बैठे तो मेरी छोटी बच्ची एक कुर्सी घसीटकर पर ले आई और उसके ऊपर खड़ी होकर बोली, "मैं तुमसे बड़ी हूँ। तुम मुझसे छोटे हो।"

और मेरे दिल में यह बात चुभ गई और मैंने मुड़कर अपनी बड़ाई की तरफ देखा, मगर वह बिजली के प्रकाश में गायब हो चुकी थी।

-सुदर्शन

[झरोखे, हिन्द किताब्स लिमिटेड, 1947]

 

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