भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।

Find Us On:

English Hindi
दिविक रमेश की चार कविताएँ  (काव्य)     
Author:दिविक रमेश

सुनहरी पृथ्वी

सूरज
रातभर
मांजता रहता है
काली पृथ्वी को

तब जाकर कहीं
सुनहरी
हो पाती है
पृथ्वी।

 

#

पूरा आदमी

आकाश
चीख नहीं सकता
हम
चीख सकते हैं आकाश में।

कोई
क्या चीख सकता है
हम में ?


#

 

नहर

नदी
नहर होकर
मेरे गाँव आयी

नहर
फिर भी
नदी
न हो पायी।

 

#

 

रिश्ता - ठीक वही रिश्ता

नहीं चढ़ती कभी
लहर
लहर पर।

बस हल्का सा दबाव देकर
आगे की अपनी लहर को
कुछ और आगे बढ़ाती है।

और पीछे की लहर से भी
ठीक वही रिश्ता चाहती है।

- दिविक रमेश

 

Back

Comment using facebook

 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 

 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश