भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है। - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।

Find Us On:

English Hindi
काश! मैं भगवान होता (काव्य)     
Author:दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

काश! मैं भगवान होता
तब न पैसे के लिए यों
हाथ फैलाता भिखारी
तब न लेकर कोर मुख से
श्वान के खाता भिखारी
तब न यों परिवीत चिथड़ों में
शिशिर से कंपकंपाता
तब न मानव दीनता औ'
याचना पर थूक जाता
तब न धन के गर्व में यों
सूझती मस्ती किसी को
तब ना अस्मत निर्धनों की
सूझती सस्ती किसी को
तब न अस्मत निर्धनों की
सूझती सस्ती किसी को
तब न भाई भाइयों पर
इस तरह खंजर उठाता
तब न भाई भगनियों का
खींचता परिधान होता
काश! मैं भगवान होता।

तब किसानों पर किसी का
यों न अत्याचार होता
तब मचा हर पल जगत में
यों न हाहाकार होता
तब न ले हल-बैल तपती
धूप में वह दीन चलता
तब न कवि के लोचनों से
अश्रु का झरना निकलता
तब न यों मज़दूर पैसे
के लिए मजबूर दिखता
तब न रोटी की फिकर में
इस तरह मज़दूर बिकता
तब न यों श्रम-स्वेद कण से
लिप्त मानव काम करता
तब न हंटर मार देना
इस तरह आसान होता |
काश! मैं भगवान होता

तब न यों बन दीन मानव
मार खाता क्रुद्ध रवि की
तब न यों धनवान मानव
आह पाता क्षुब्ध कवि की ।'

- दुष्यंत कुमार

Back

Comment using facebook

 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 

 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश