हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

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मानसिकता | लघु-कथा Click To download this content
 
 

वे एक प्राइवेट स्कूल में काम करते थे और उनका बेटा रवि भी उसी स्कूल में पढ़ता था। वे बहुत परिश्रमी और  आदर्श शिक्षक थे। प्राइवेट स्कूल और सरकारी स्कूल में मिलने वाली सुविधाओं और वेतन में जमीन-आसमान का अंतर रहता है जो सर्वविदित है। वे भी बरसों से प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी स्कूल में नौकरी मिल जाए।

बहुत परिश्रम और भाग-दौड़ के बाद उन्हें एक सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई थी। अब तो वे भी सब सरकारी सुविधाएं और भत्तों का भरपूर आनंद उठाया करेंगे। सब रिश्तेदार, परिचित और मित्र उन्हें बधाई दे रहे थे।

"'कब से ज्वाइन कर रहे हैं?" मैंने बधाई देते हुए कहा।

"बस, अगले सप्ताह ही!"

"'तो..रवि भी स्कूल छोड़ रहा है?" मैंने पूछा।

"'नहीं, नहीं...रवि..तो वहीं पढ़ेगा!"

"'अरे, सरकारी स्कूल में कहाँ पढ़ाई होती है?" एक अन्य मित्र ने वार्तालाप आगे बढ़ाया।

हर शिक्षक नौकरी तो सरकारी विद्यालय में करना चाहता है लेकिन अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना चाहता है!  अवश्य ही उन्हें सरकारी सुविधाएं आकर्षित करती होंगी अन्यथा वे नौकरी भी प्राइवेट स्कूलों में ही करते! ...लेकिन क्या पढ़ाई का स्तर और सुविधाएं छात्रों को नहीं दी जा सकती ताकि 'सरकारी स्कूल में पढ़ाई कहाँ होती है?' वाली मानसिकता परिवर्तित हो जाए!

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

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