समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। - जनार्दनप्रसाद झा 'द्विज'।

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जैनेन्द्र जयंती | 2 जनवरी
   
 

हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार तथा निबंधकार जैनेन्द्र कुमार का जन्म 2 जनवरी, 1905 को कौड़ियागंज जिला अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश) में हुआ था। उनके बचपन का नाम आनंदीलाल था।

जैनेन्द्रजी की आरंभिक शिक्षा सन्‌ 1911-18 तक ऋषभ ब्रह्‌मचर्याश्रम, हस्तिनापुर में हुई। 1919-20 में उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में अध्ययन किया।

डॉ. के. एम. मुंशी तथा प्रेमचंद के साथ मिलकर आपने महात्मा गांधी की अध्यक्षता में 'भारतीय साहित्य परिषद' की स्थापना की। प्रेमचंद की मृत्यु के उपरांत 'हंस' का संपादन भी किया। हंस में 'प्रेम में भगवान', 'पाप और प्रकाश' शीर्षक से आपने टॉल्सटॉय की कहानियों व नाटक का अनुवाद भी किया।

जैनेन्द्रजी के अपने समय में महात्मा गांधी, विनोबा भावे, रवीन्द्रनाथ टैगोर, पं. जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी के साथ सतत संबद्ध रहे।

तिरासी वर्ष की अवस्था में 24 दिसम्बर, 1988 को जैनेन्द्र कुमार का निधन हो गया।

 

 
पत्नी
शहर के एक ओर तिरस्कृत मकान। दूसरा तल्ला, वहां चौके में एक स्त्री अंगीठी सामने लिए बैठी है। अंगीठी की आग राख हुई जा रही है। वह जाने क्या सोच रही है। उसकी अवस्था बीस-बाईस के लगभग होगी। देह से कुछ दुबली है और संभ्रांत कुल की मालूम होती है।

पाजेब
बाजार में एक नई तरह की पाजेब चली है। पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं।

 
 
 

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