वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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वंशीधर शुक्ल

जनकवि वंशीधर शुक्ल का जन्म जनवरी, 1904 ( बसंत पंचमी) को हुआ। मार्च 1928 में गणेश शंकर विद्यार्थी के आग्रह पर वंशीधर शुक्ल ने सुप्रसिद्ध कविता 'खूनी पर्चे' की रचना की। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस कविता को, 'खूनी पर्चा' का नाम दिया था। पोस्टर के रूप में यह पूरे देश में बंटी। अँग्रेज़ी शासन के अंत तक इसके रचयिता का पता न लग सका। शुक्ल जी ने कक्षा चार तक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने हिंदी व अवधी में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कविताएं लिखीं।

शुक्लजी का गीत, 'क़दम-क़दम बढाये जा खुशी के गीत गाये जा, ये जिंदगी है कौम की तू कौम पर लुटाए जा' नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को इतना पसंद आया कि इसे 'आज़ाद-हिंद फौज' में मार्च गीत के रूप में गाया गया।

आदर्श राजनीति करने वाले वंशीधर शुक्ल मन से एक कवि थे।  आप खीरी जिले की श्रीनगर विधानसभा सीट से सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक बने। वंशीधर शुक्ल ने अपना पूरा जीवन गांव में बिताया।  स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले और,  'उठ जाग मुसाफिर भोर भई...' जैसे अमर गीत लिखने वाले इस जनकवि/राजनीतिज्ञ  का 26 अप्रैल 1980 को निधन हो गया।



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खूनी पर्चा

अमर भूमि से प्रकट हुआ हूं, मर-मर अमर कहाऊंगा,
जब तक तुझको मिटा न लूंगा, चैन न किंचित पाऊंगा।
तुम हो जालिम दगाबाज, मक्कार, सितमगर, अय्यारे,
डाकू, चोर, गिरहकट, रहजन, जाहिल, कौमी गद्दारे,
खूंगर तोते चश्म, हरामी, नाबकार और बदकारे,
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ओ शासक नेहरु सावधान

ओ शासक नेहरु सावधान,
पलटो नौकरशाही विधान।
अन्यथा पलट देगा तुमको,
मजदूर, वीर योद्धा, किसान।

-वंशीधर शुक्ल

 

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ओ शासक नेहरु सावधान

ओ शासक नेहरु सावधान,
पलटो नौकरशाही विधान।
अन्यथा पलट देगा तुमको,
मजदूर, वीर योद्धा, किसान।

-वंशीधर शुक्ल

 

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उठो सोने वालों

उठो सोने वालों सबेरा हुआ है।
वतन के फ़क़ीरों का फेरा हुआ है॥

उठो अब निराशा निशा खो रही है
सुनहली-सी पूरब दिशा हो रही है
उषा की किरण जगमगी हो रही है
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उठ जाग मुसाफिर भोर भई

उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है

खोल नींद से अँखियाँ जरा और अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीति करन की रीती नहीं प्रभु जागत है तू सोवत है
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
...

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