भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

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बाबू गुलाबराय | Babu Gulabrai

बाबू गुलाबराय का जन्म 17 जनवरी, 1888 को इटावा (उ.प्र.) में हुआ था।

आप एम.ए. (दर्शनशास्त्र), एल-एल.बी., डी.लिट. (आगरा विश्वविद्यालय द्वारा मानद उपाधि) थे।

आपने लगभग पचास महत्त्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों का सृजन किया। ‘साहित्य संदेश' पत्रिका तथा अनेक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथों का संपादन भी किया।

नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा में साहित्य रत्न तथा विशारद् की कक्षाओं का अध्यापन (अवैतनिक) किया। आपने अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं एवं समितियों में नीति संचालन में सहयोग दिया। साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की परिषदों नागरी प्रचारिणी सभा आगरा, ब्रज साहित्य मंडल तथा उच्च संस्थानों का सभापतित्व किया।

13 अप्रैल, 1963 को आगरा में आपका निधन हो गया।


साहित्यिक कृतियाँ :

निबंध संग्रह- प्रकार प्रभाकर, जीवन-पशु-ठलुआ क्लब, मेरी असफलताएँ, मेरे मानसिक उपादान, जीवन रश्मियाँ, कुछ उथले, कुछ गहरे, बाबू गुलाब राय की हास्य-व्यंग्य रचनाएं इत्यादि।

आलोचनात्मक रचनाएँ- नवरस, हिंदी साहित्य का सुबोध इतिहास हिंदी, नाट्य विमर्श, आलोचना कुसुमांजलि, काव्य के रूप, सिद्धांत और अध्ययन इत्यादि।

दर्शनसंबंधी- कर्तव्य, शास्त्र, तर्क शास्त्र, बौद्ध धर्म पाश्चात्य दर्शनों का इतिहास, भारतीय संस्कृति की रूपरेखा

बाल साहित्य- विज्ञान वार्ता, बाल प्रबोध आदि।

संपादन ग्रंथ- सत्य हरिश्चंद्र, भाषा-भूषण, कादंबरी कथा-सार आदि।

पुरस्कार/सम्मान: साहित्यकार संसद, प्रयाग, प्रांतीय तथा केंद्रीय सरकारों द्वारा पुरस्कृत।

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आशापञ्चक

आशा वेलि सुहावनी. शीतल जाको छांहि ।
जिहि प्रिय सुमन सुफलन ते, मधराई अधिकाहिं

आशा दीपक करत नीत, जिहि हिरदे में बास
ज्यों ज्यों छावे तिमिर घन, त्यों त्यों बड़े प्रकास

मानव-जीवन को सुखद, सरस जु देत बनाइ
सो आशा संजीवनी, किहि हत-भाग न भाइ

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