परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें। - हरगोविंद सिंह।

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नरेंद्र शर्मा

नरेंद्र शर्मा का जन्म 28 फरवरी 1913 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा, जहांगीरपुर में हुआ था। पं. नरेंद्र शर्मा ने इलाहबाद विश्वविद्यालय से शिक्षाशास्त्र और अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद 1913 में प्रयाग में 'अभ्युदय' पत्रिका के सम्पादन से जुड़ गए। प्रयाग से प्रकाशित साप्ताहिक "अभ्युदय" के संस्थापक पण्डित मदन मोहन मालवीय थे। नरेंद्र शर्मा के जीवन को यहीं से नई दिशा मिली।

आप अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी स्वराज्य भवन में हिंदी अधिकारी भी रहे। फिल्मों में गीत लिखने के साथ-साथ स्वतंत्र लेखन भी करते रहे। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के प्रोत्साहन और आग्रह पर पं. नरेंद्र शर्मा मुंबई आ गए और यहीं बस गए। बॉम्बे टाकीज़ के लिए फ़िल्मी गीत भी लिखे।

लेखन के साथ-साथ आकाशवाणी से भी जुड़े रहे। 3 अक्टूबर 1957 को भारतीय रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में एक नया अध्याय जुड़ा 'विविध भारती' नाम से। 'विविध भारती' का प्रस्ताव पंडित नरेंद्र शर्मा ने ही दिया था।

'प्रवासी के गीत', 'मिट्टी और फूल', 'अग्निशस्य', 'प्यासा निर्झर', 'मुठ्ठी बंद रहस्य' नरेंद्र शर्मा की प्रमुख काव्य रचनाएं हैं।

'मनोकामिनी', 'द्रौपदी', 'उत्तरजय सुवर्णा' उनके प्रबंध काव्य हैं।

शंखनाद ने कर दिया, समारोह का अंत।
अंत यही ले जाएगा, कुरुक्षेत्र पर्यन्त।।

उपरोक्त दोहा उनके जीवन की अंतिम रचना है, जिसे उन्होंने धारावाहिक 'महाभारत' के लिए लिखा था। जब बी.आर. चोपड़ा महाभारत बना रहे थे तो नरेंद्र शर्मा उसमें सलाहकार की भूमिका निभा रहे थे। ये बी.आर. चोपड़ा के घनिष्ठ मित्रों में से थे।

पंडित नरेंद्र शर्मा की भाषा संस्कृतनिष्ठ थी, वे हिंदी में लिखते थे, एक-दो गीतों में उर्दू के भी शब्द हैं। हमारी बात, रत्नघर, फिर भी, ज्वार भाटा, सजनी, मालती माधव, चार आँखें, मेरा सुहाग, बिछड़े बालम, चूड़ियां, जेल यात्रा, भाई-बहन, सत्यम शिवम् सुंदरम जैसी कई फिल्मों के लिए उन्होंने गीत लिखे।

"यशोमती मैया से बोले नंदलाला,
राधा क्यूँ गोरी, मैं क्यूँ काला"

उपरोक्त गीत फिल्म 'सत्यम् शिवम् सुंदरम' के लिए पं. नरेंद्र शर्मा ने ही लिखा था और गीत को स्वर दिया था लता मंगेशकर ने।

11 फरवरी, 1989 को ह्‌दय-गति रुक जाने से उनका देहावसान हो गया।

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कबीर वाणी

हिन्दुअन की हिन्दुआई देखी
तुरकन की तुरकाई !
सदियों रहे साथ, पर दोनों
पानी तेल सरीखे ;
हम दोनों को एक दूसरे के
दुर्गुन ही दीखे !

घर-घर नगर-नगर में हमने
निर्दय अगन जलाई !

हम दोनों के नाम अलग
पर काम एक से, भाई !
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