अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल

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रीता कौशल

आगरा में जन्मी व पली-बढ़ी 'रीता कौशल' ऑस्ट्रेलिया निवासी हैं। ऑस्ट्रेलिया में आने से पहले वे सिंगापुर में रहीं व सिंगापुर की हिन्दी सोसाइटी में शिक्षिण का कार्य किया।

आप लेखन में गहरी रूचि रखती है। हिंदी में कविता, आलेख व कहानी विधाओं में लेखन करती हैं। हिंदी और भारतीय संस्कृति को समर्पित रीता कई रेडियो से भी जुड़ी हुई हैं।

कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियां व लेख प्रकाशित हुए हैं। वर्तमान में आप वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की लोकल गवर्ननेंट की एक काउंसिल में वित्त अधिकारी हैं। साथ ही हिन्दी समाज ऑव वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की कार्यकारिणी समिति की सदस्या हैं। समिति द्वारा प्रकाशित वार्षिक पत्रिका ‘भारत-भारती' का संपादन करती है।

Author's Collection

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विडम्बना

मैंने जन्मा है तुझे अपने अंश से
संस्कारों की घुट्टी पिलाई है ।
जिया हमेशा दिन-रात तुझको
ममता की दौलत लुटाई है ।

तेरे आँसू के मोती सहेजे हमेशा
स्नेह की सुगंध से महकायी है ।
उच्च विचारों की आचार-संहिता
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अंतर्द्वंद्व

ऐ मन! अंतर्द्वंद्व से परेशान क्यों है?
जिंदगी तो जिंदगी है, इससे शिकायत क्यों है?

अधूरी चाहतों का तुझे दर्द क्यों है?
मृग मारीचिका में आखिर तू फँसा क्यों है?

सपने सभी हों पूरे तुझे ये भ्रम क्यों है?
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यथार्थ

आँखें बरबस भर आती हैं,
जब मन भूत के गलियारों में विचरता है ।
सोच उलझ जाती है रिश्तों के ताने-बाने में,
एक नासूर सा इस दिल में उतरता है ।

भीड़ में अकेलेपन का अहसास दिल को खलता है,
जीवन की भुल-भुलैया में अस्तित्व खोया सा लगता है ।
...

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