हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

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वृंदावनलाल वर्मा

वृंदावनलाल वर्मा का जन्म 9 जनवरी, 1889 को मऊरानीपुर, झाँसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। आपके पिता का नाम अयोध्या प्रसाद था।

वृंदावनलाल वर्मा जी के विद्या-गुरु स्वर्गीय पण्डित विद्याधर दीक्षित थे। आप प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार एवं निबंधकार थे।

आपने मुख्यत: नाटक, कहानी, निबंध व उपन्यास विधाओं में सृजन किया है।

साहित्य कृतियां:

उपन्यास : अहिल्या बाई, भुवन विक्रम, गढ़ कुण्डार, विराटा की पद्मिनी, झांसी की रानी, कचनार, मुसाहिबजू, माधवजी सिंधिया, टूटे कांटे, मृगनयनी, संगम, लगान, कुण्डली चक्र, प्रेम की भेनी, कभी न कभी, आँचल मेरा कोई, राखी की लाज, अमर बेल।

नाटक : हंस मयूर, बांस की फांस, पीले हाथ, केवट, पूर्व की ओर, नीलकंठ, मंगल सूत्र, बीरबल, ललित विक्रम।

निधन: 23 फरवरी, 1969 को आपका निधन हो गया।

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मेंढ़की का ब्याह

उन जिलों में त्राहि-त्राहि मच रही थी। आषाढ़ चला गया, सावन निकलने को हुआ, परन्तु पानी की बूंद नहीं। आकाश में बादल कभी-कभी छिटपुट होकर इधर-उधर बह जाते। आशा थी कि पानी बरसेगा, क्योंकि गांववालों ने कुछ पत्रों में पढ़ा था कि कलकत्ता-मद्रास की तरफ जोर की वर्षा हुई है। लगते आसाढ़ थोड़ा सा बरसा भी था । आगे भी बरसेगा, इसी आशा में अनाज बो दिया गया था । अनाज जम निकला, फिर हरियाकर सूखने लगा। यदि चार-छ: दिन और न बरसा, तो सब समाप्त । यह आशंका उन जिलों के गांवों में घर करने लगी थी। लोग व्याकुल थे।

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