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तोताराम सनाढ्य

तोताराम सनाढ्य का जन्म 1876 में हिरनगी (फीरोजाबाद) में हुआ था।  आपके 'रामलाल' और 'दुर्गा प्रसाद' दो भाई थे। पिता की असामयिक मृत्यु व कोई विशेष पैतृक सम्पत्ति न होने के कारण आपका बचपन निर्धनता में बीता।  रोजगार की तलाश में भटकते हुए आप एक आरकाटी के हाथों जा पड़े जिसने आपको फीज़ी जाने का सुझाव दिया।  आपको सब्ज़बाग दिखाते हुए उसने कहा,"देखो भाई, जहाँ तुम नौकरी करोगे वहाँ तुम्हें दुःख नहीं सहने पड़ेंगे। तुम्हें वहाँ किसी बात की तकलीफ नहीं होगी। खूब पेट-भर गन्ने और केले खाना और चैन की बंशी बजाना।"

तोताराम दरिद्रता से छुटकारा चाहते थे। झट से तैयार हो गए।  कुछ दिनों में सब औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं।

तोताराम का बताया गया था कि फिजी में उन्हें 12 आना रोज मिलेंगे और 5 वर्ष तक खेती का काम करना होगा। यदि वहाँ से पाँच वर्ष बाद लौटोगे तो अपने पास से किराया देना होगा और यदि 10 वर्ष बाद लौटेंगे तो सरकार अपने पास से भाड़ा देगी। वहाँ बहुत रुपये कमा सकते हैं। वहाँ बड़े आनंद हैं। फिजी क्या है - बस, स्वर्ग है!

अब तोताराम जहाज में सवार होकर अपने आप को भाग्यशाली मान रहे थे। सिंगापुर, बोर्नियो इत्यादि की समुद्री यात्रा से होता हुआ तीन महीने में जहाज फीज़ी आ पहुँचा।

इस प्रकार आप 1893 में गिरमिटिया मजदूर के रूप में फिजी पहुँच गए ।

वहाँ आपने भारतीय मजदूरो की जो दशा देखी, उससे बहुत विचलित हुए और उनके कल्याण के लिए काम करने लगे।


भारत वापसी व साहित्य-सृजन:

21 वर्ष तक फीज़ी में रहने के पश्चात 27 मार्च 1914 को आप फीज़ी से भारत के लिए रवाना हुए और मई, 1914 में आप भारत पहुँच गए। वहीं आपने 'फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष' पुस्तक लिखी जो एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गई। यह पुस्तक कई भाषाओं में अनुदित हुई।

इसके अतिरिक्त उनकी 'बूतलैन की कथा' ( The story of the Haunted Line) भी प्रकाशित हुई है।

फीज़ी द्वीप में गिरमिटिया प्रथा 1 जनवरी 1920 को समाप्त हो गई। इसमें अन्य लोगों के अतिरिक्त तोताराम सनाढ्य तथा उनकी इस पुस्तक की महत्वपूर्ण भूमिका रही।


सामाजिक जीवन:

आपने 1902 में नावुआ में पहली बार रामलीला आरंभ की।

अापने फीज़ी में बसे शर्तबंध मज़दूरों यानी अनुबंधित श्रमिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। भारतीय श्रमिकों का जीवन सुधारने के प्रयास हेतु महात्मा गांधी से सम्पर्क साधा।


निधन:
1947 में साबरमती आश्रम में रहते हुए आपका निधन हो गया।

तोताराम की मृत्यु पर महात्मा गांधी ने लिखा, 'वयोवृद्ध तोताराम जी किसी से भी सेवा लिए बगैर ही गए। वे साबरमती आश्रम के भूषण थे। विद्वान तो नहीं, पर ज्ञानी थे। भजनों के भंडार थे, फिर भी गायनाचार्य थे। अपने एकतारे और भजनों से आश्रमवासियों को मुग्ध कर देते थे। ... "परोपकाराय सतां विभूतयः" तोताराम जी में यह अक्षरशः सत्य रहा।'

प्रस्तुति: रोहित कुमार 'हैप्पी'

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फिज़ी द्वीप में मेरे 21 वर्ष

यदि आप शर्तबंध मज़दूरों यानी अनुबंधित श्रमिकों के बारे में जानना चाहते हैं तो फ़िजी प्रवास पर लिखी गई तोताराम सनाढय की पुस्तक इस क्रम में सर्वश्रेष्ठ कही जा सकती है। वे स्वयं अनुबंधित श्रमिक के रूप में फ़िजी गए थे और इसके यह आत्मकथा उन हज़ारों श्रमिकों की कहानी है जो धोखे से, झूठे सब्ज़बाग दिखाके फ़िजी भेज दिए गए थे।

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