हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

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कुँअर बेचैन

डॉ० कुँअर बेचैन का वास्तविक नाम डॉ० कुँवर बहादुर सक्सेना है।

आपका जन्म 1 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के उमरी गांव (ज़िला मुरादाबाद) में हुआ था। आपका बचपन चंदौसी में बीता। आप एम.कॉम, एम.ए (हिंदी) व पी-एच.डी हैं।

आपने ग़ाज़ियाबाद के एम.एम.एच. महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में अध्यापन किया व रीडर भी रहे। आप हिंदी ग़ज़ल व गीत के हस्ताक्षर हैं।

आपके अनेक विधाओं मे साहित्य-सृजन किया है। आपके अनेक गीत संग्रह, ग़ज़ल संग्रह, काव्य संग्रह, महाकाव्य तथा एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं।

सम्मान: साहित्य सम्मान (1977), उ०प्र० हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण (2004), परिवार पुरस्कार सम्मान, मुंबई (2004), राष्ट्रपति महामहिम ज्ञानी जैलसिंह एवं महामहिम डॉ० शंकरदयाल शर्मा द्वारा सम्मानित, अनेक विश्व विद्यालयों तथा महाराष्ट्र एवं गुजरात बोर्ड के पाठ्यक्रमों मे संकलित।

 

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कुंअर बेचैन ग़ज़ल संग्रह

कुंअर बेचैन ग़ज़ल संग्रह - यहाँ डॉ० कुँअर बेचैन की बेहतरीन ग़ज़लियात संकलित की गई हैं। विश्वास है आपको यह ग़ज़ल-संग्रह पठनीय लगेगा।

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तुम्हारे जिस्म जब-जब | ग़ज़ल

तुम्हारे जिस्म जब-जब धूप में काले पड़े होंगे
हमारी भी ग़ज़ल के पाँव में छाले पड़े होंगे

अगर आँखों पे गहरी नींद के ताले पड़े होंगे
तो कुछ ख़्वाबों को अपनी जान के लाले पड़े होंगे

कि जिन की साज़िशों से अब हमारी जेब ख़ाली है
वो अपने हाथ जेबों में कहीं डाले पड़े होंगे

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आज जो ऊँचाई पर है...

आज जो ऊँचाई पर है क्या पता कल गिर पड़े
इतना कह के ऊँची शाख़ों से कई फल गिर पड़े

साँस की पायल पहन कर ज़िंदगी निकली तो है
क्या पता कब टूट कर ये उस की पायल गिर परे

ये भी हो सकता है पत्थर फेंकने वालों के साथ
उन का पत्थर ख़ुद उन्हें ही कर के घायल गिर पड़े

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