वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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सपना मांगलिक

सपना मांगलिक (Sapna Manglik) का जन्म भरतपुर, राजस्थान में 17 फरवरी 1981 को हुआ। आप आगरा में निवास करती हैं।

आपने एम.ए.; बी.एड.; एक्सपोर्ट मैनेजमेंट डिप्लोमा किया है।

प्रकाशन : पापा कब आओगे, नौकी बहू (कहानी संग्रह), सफलता रास्तों से मंज़िल तक, ढाई आखर प्रेम का (प्रेरक गद्द्य संग्रह),कमसिन बाला, कल क्या होगा, बगावत (काव्य संग्रह), जज़्बा-ए-दिल भाग -प्रथम, द्वितीय, तृतीय (ग़ज़ल संग्रह), टिमटिम तारे, गुनगुनाते अक्षर, होटल जंगल ट्रीट (बाल साहित्य)

प्रसारण : आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर निरंतर रचनाओं का प्रसारण

संपादन : तुम को ना भूल पायेंगे (संस्मरण संग्रह) स्वर्ण जयंती स्मारिका (समानांतर साहित्य संस्थान)

संस्थापक : जीवन सारांश समाज सेवा समिति, बज़्म-ए-सारांश (उर्दू हिंदी साहित्य समिति)

सदस्य : ऑथर गिल्ड ऑफ़ इंडिया, अखिल भारतीय गंगा समिति जलगांव, महानगर लेखिका समिति आगरा, साहित्य साधिका समिति आगरा, सामानांतर साहित्य समिति आगरा, आगमन साहित्य परिषद् हापुड़, इंटेलिजेंस मिडिया एसोशिसन दिल्ली

सम्मान : विभिन्न राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित

रचना कर्म : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

सम्पर्क : sapna8manglik@gmail.com

 

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राधा प्रेम

मोर मुकट पीताम्बर पहने,जबसे घनश्याम दिखा
साँसों के मनके राधा ने, बस कान्हा नाम लिखा
राधा से जब पूँछी सखियाँ, कान्हा क्यों न आता
मैं उनमें वो मुझमे रहते, दूर कोई न जाता
द्वेत कहाँ राधा मोहन में, यों ह्रदय में समाया
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जैसा राम वैसी सीता | कहानी

आज फिर स्कूल जाते वक्त बिन्दिया दिखाई पड गयी । ना जाने क्यों यह विन्दिया जब तब मेरे सामने आ ही जाती है । शायद 'लॉ ऑफ़ रिवर्स इफेक्ट' मनुष्यों पर कुछ ज्यादा लागू होता है जिस आदमी से हम कन्नी काटना चाहते हैं या जिसे देखने मात्र से मन ख़राब हो जाता है वही अकसर आपके सामने आकर खड़ा हो जाता है । हालाँकि बिंदिया ने कभी मेरे साथ कुछ गलत नहीं किया है बल्कि सामने पड़ते ही हमेशा नमस्ते मास्टरजी कहकर मेरा अभिवादन ही करती है । फिर भी उसकी दिलफेंक अदा, द्विअर्थी बातें और पुरुषों के साथ उन्मुक्त हास परिहास नारीत्व की गरिमा के अनुरूप कतई नहीं कहा जा सकता । मोहल्ले के लोग उसे चरित्रहीन ही समझते थे और वही विचार मेरा भी था । हालांकि मेरे अन्दर का शिक्षक और दार्शनिक मानव को उसूलों और रिवाजों की कसौटी पर मापने के लिए मुझे धिक्कारता था मगर दिमाग की प्रोग्रामिंग तो बचपन से डाले गए संस्कारों से हो गयी थी । जैसे कम्प्यूटर को प्रोग्राम किया जाता है वह वैसे ही निर्देशों का पालन करता है ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क है ।

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