यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।

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डॉ सुनीता शर्मा | न्यूज़ीलैंड

डॉ सुनीता शर्मा ऑकलैंड (न्यूज़ीलैंड) निवासी हैं। आप भारत से एम.ए.(हिंदी) व पीएच. डी हैं।

आपकी साहित्य सृजन, संगीत, नृत्य व तैराकी में रुचि है।

साहित्य कृतियाँ: मैं गांधारी नहीं (कविता संग्रह), जागृति(कहानी संग्रह)। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां तथा कविताएं प्रकाशित।

 

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शस्य श्यामलां

एक पत्थर फेंका गया मेरे घर में
फ़ेंकना चाहती थी
मैं भी उसे किसी शीश महल में
पर आ किसी ने हाथ रोक लिए
मंदिर में सजा दिया उसे
अब हो व्याकुल
कहीं नमी देखते ही
बो देना चाहती हूँ
आस्था विश्वास के बीज
लहलहा उठे फसलें
...

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जवाब

दोहराता रहेगा इतिहास
भी युगों-युगों तक यह
दुर्योधन - दुशासन की
कुटिल राजनीति की
बिसात पर खेली गयी
द्रौपदी चीर-हरण जैसी
प्रवासी मजदूरों की
अनोखी कहानी,
जब पूरी सभा रही मौन
और मानवता - सिसकती
व कराहती हुई
...

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मेरा दिल मोम सा | कविता

खिड़की दरवाजे लोहे के बना
बोल्ट कर लिए हैं मैंने
कोई कण धूल-सा आंखों में
ना चुभ जाए कहींl
मेरा दिल मोम सा
पिघल न जाए कहींl
बिस्तर पर भी चप्पल
उतारने से कतराती हूँ मैं
कोई फूल कांटा बनकर
ना चुभ जाए कहींl
...

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बस...या ख़ुदा | कविता

खिड़की दरवाजे लोहे के बना
बोल्ट कर लिए हैं मैंने
कोई कण धूल-सा आंखों में
ना चुभ जाए कहींl
मेरा दिल मोम सा
पिघल न जाए कहींl
बिस्तर पर भी चप्पल
उतारने से कतराती हूँ मैं
कोई फूल कांटा बनकर
ना चुभ जाए कहींl
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सुनीता शर्मा के हाइकु

भाव ही भाव
आजकल आ-भा-व
है कहीं कहां

नजरों से यूँ
होता कत्ले आम
अब आम है

हरसिंगार
से चेहरे मेरे मोती
उसके फूल

नेता तेरे ही
नाम -चोरी- घोटाला
भ्रष्टाचार

चांदनी रात
निस्तब्ध- सोए -ओढे
मौत - कफन

बादल कहें
...

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