यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।

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डॉ माधवी श्रीवास्तवा | न्यूज़ीलैंड

डॉ माधवी श्रीवास्तवा का जन्म उत्तर-प्रदेश के सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल वाराणसी में 15 अगस्त 1975 को एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। सेकंडरी शिक्षा के उपरांत देश के बहु चर्चित इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूर्व स्नातक, स्नातकोत्तर और संस्कृत भाषा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भूतपूर्व वाइस चांसलर प्रोफेसर डॉ. सुरेश चंद्र श्रीवास्तव के निर्देशन में डी. फिल् की उपाधि ग्रहण की।

डॉ माधवी एक ऐसे परिवार से संबंध रखती हैं जिसका कला और साहित्य से विशेष अनुराग रहा है।

कृतियाँ
निबंध लेख- 'योग शिक्षा और हिंदी' धनक पत्रिका, न्यूजीलैंड में प्रकाशित।

कहानी- 'सती का बलिदान', ‘प्रेम का भ्रम' ( नोशन प्रेस, भारत से प्रकाशित) 'प्रेम का अनादर', 'दो लड़कियाँ', ‘श्रावण की पवित्र बेला', 'किसान की बेटी', ‘विश्वासघात', 'लज्जा', ‘विप्रलम्भ' इत्यादि रचनायें प्रतिलिपी ई-पत्रिका में प्रकाशित हुईं हैं।

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महारानी का जीवन

राम आज अत्यधिक दुःखी थे। उनका मन आज किसी कार्य में स्थिर नहीं हो रहा था। बार-बार सीता की छवि उन्हें विचलित कर रही थी। वह पुनः पञ्चवटी जाना चाहते थे, कदाचित यह सोच कर कि सीता वहाँ मिल जाये यदि सीता न भी मिली तो सीता की स्मृतियाँ तो वहाँ अवश्य ही होंगी। राज-काम से निवृत्त होकर राम अपने कक्ष में वापस आ जाते हैं। प्रासाद में रहते हुए भी उन्होंने राजमहल के सुखों से अपने आप को वंचित कर रखा था, यह सोचकर कि मेरी सीता भी तो अब अभाव पूर्ण जीवन जी रही होगी। पता नहीं वह क्या खाती होगी...? कहाँ सोती होगी...? इसी चिंता में आज उन्हें भूख भी नहीं लग रही थी। राजसी भोजन का तो परित्याग उन्होंने पहले ही कर दिया था। आज उन्होंने कन्द-मूल भी ग्रहण नहीं किये थे। जिससे माता कौशल्या अत्यंत चिंतित हो गयी थी। वह राम से मिलने उनके कक्ष की ओर जाती हैं, परन्तु मार्ग में ही सिपाही उन्हें रोक देते हैं।

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