यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।

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अब्बास रज़ा अल्वी | ऑस्ट्रेलिया

अब्बास रज़ा अल्वी भारतीय मूल के ऑस्ट्रेलिया के नागरिक हैं। आपका जन्म फतेहगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ था। 

आपकी शिक्षा-दीक्षा फतेहगढ़, अलीगढ़ विश्वविद्यालय तथा मास्को में हुई।

साहित्य, संगीत, चित्रकला और अभिनय के अतिरिक्त बागबानी का भी शौक है। आपकी कई सी डी भी निकली हैं। 

 

 

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रंगीन पतंगें

अच्छी लगती थी वो सब रंगीन पतंगे
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगे

कुछ सजी हुई सी मेलों में
कुछ टँगी हुई बाज़ारों में
कुछ फँसी हुई सी तारों में
कुछ उलझी नीम की डालों में
कुछ कटी हुई कुछ लुटी हुई
पर थीं सब अपनी गाँवों में
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छोटी सी बिगड़ी बात को

छोटी सी बिगड़ी बात को सुलझा रहे हैं लोग
यह और बात है के यूँ उलझा रहे हैं लोग

चर्चा तुम्हारा बज़्म में ग़ैरों के इर्द गिर्द
कुछ इस तरह से दिल मेरा बहला रहे हैं लोग

अरमाँ नये साहिल नये सब सिलसिले नये
उजड़े हुए दायर में दिखला रहे हैं लोग

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विडम्बना | अब्बास रज़ा अल्वी की कविता

आज मैं पीटी नहीं मार डाली गयी हूँ
मैं पीटी गयी तुम देखते रहे
ख़बरों की सुर्ख़ियों में पढ़ते रहे
कम्प्युटर पर ईमेल में भेजते रहे
टीवी के स्क्रीन पर सुनते रहे
मैं बार बार पीटी गयी
तुम बार-बार देखते रहे
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मेरे देश का एक बूढ़ा कवि

फटे हुए लिबास में क़तार में खड़ा हुआ
उम्र के झुकाओ में आस से जुड़ा हुआ
किताब हाथ में लिये भीड़ से भिड़ा हुआ
कोई सुने या न सुने आन पे अड़ा हुआ

आँखें कुछ धँसी हुई थीं, हाथ थरथरा रहे थे
होंट कुछ फटे हुए थे, पैर डगमगा रहे थे
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