साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।

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रीता कौशल

आगरा (उत्तर प्रदेश) में जन्मी व पली-बढ़ी 'रीता कौशल' ऑस्ट्रेलिया की नागरिक हैं। ऑस्ट्रेलिया में आने से पहले वे सिंगापुर में रहीं व सिंगापुर की हिंदी सोसाइटी व डी. ए. वी. हिंदी स्कूल सिंगापुर में शिक्षिण का कार्य किया। इसके अतिरिक्त विभिन्न संस्थाओं में स्वयंसेवक के रूप में सक्रिय रहीं। 

वर्तमान में आप वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की लोकल गवर्ननेंट की एक कौंसिल में वित्त अधिकारी हैं। 

आप लेखन में गहरी रूचि रखती है। हिंदी में कविता, आलेख व कहानी विधाओं में लेखन करती हैं। हिंदी और भारतीय संस्कृति को समर्पित रीता कई रेडियो से भी जुड़ी हुई हैं।

प्रकाशन : कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियां व लेख प्रकाशित हुए हैं। 

आपकी दो साहित्यिक कृतियाँ ‘रजकुसुम’ कहानी संग्रह व ‘चंद्राकांक्षा’ काव्य संग्रह प्रकाशित हुई हैं। 

संपादन : हिंदी समाज ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की वार्षिक पत्रिका ‘भारत-भारती' का संपादन व प्रकाशन करती है।

ई-मेल : rita210711@gmail.com

फोन: +61402653495

संपर्क: PO Box 48, Mosman Park, Western Australia 6912

यूट्यूब चैनल: https://www.youtube.com/channel/UCdCib0rJDf-c705bTjNb_Vg

फेसबुक पेज: https://www.facebook.com/RitaKaushalPoet

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विडम्बना

मैंने जन्मा है तुझे अपने अंश से
संस्कारों की घुट्टी पिलाई है ।
जिया हमेशा दिन-रात तुझको
ममता की दौलत लुटाई है ।

तेरे आँसू के मोती सहेजे हमेशा
स्नेह की सुगंध से महकायी है ।
उच्च विचारों की आचार-संहिता
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देसियों के विदेशी बुखार

जैसे ही दिवाली आने वाली होती है सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तैरने लगती है कि चीन की बनी इलेक्ट्रिक झालर मत खरीदो, अपने यहाँ के कुम्हारों के बने दीये खरीद कर दिवाली पर जलाओ। ऐसा ही रक्षाबंधन के आसपास राखी के धागों को लेकर होता है पर क्या आज ग्लोबलाइजेशन के दौर में विदेशी सामान की खरीद से बचना इतना आसान है? इन फेसबुक पोस्ट को देख कर लगता है कि हम भारतीयों की देशभक्ति एक मौसमी बुखार की तरह है जो कुछ खास मौसम में ही जोर मारती है।

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अंतर्द्वंद्व

ऐ मन! अंतर्द्वंद्व से परेशान क्यों है?
जिंदगी तो जिंदगी है, इससे शिकायत क्यों है?

अधूरी चाहतों का तुझे दर्द क्यों है?
मृग मारीचिका में आखिर तू फँसा क्यों है?

सपने सभी हों पूरे तुझे ये भ्रम क्यों है?
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यथार्थ

आँखें बरबस भर आती हैं,
जब मन भूत के गलियारों में विचरता है ।
सोच उलझ जाती है रिश्तों के ताने-बाने में,
एक नासूर सा इस दिल में उतरता है ।

भीड़ में अकेलेपन का अहसास दिल को खलता है,
जीवन की भुल-भुलैया में अस्तित्व खोया सा लगता है ।
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