हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। - वी. कृष्णस्वामी अय्यर

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इश्तहार | लघु-कथा

"मेरा बहुत सा क़ीमती सामान जिसमें शांति, सद्‌भाव, राष्ट्र-प्रेम, ईमानदारी, सदाचार आदि शामिल हैं - कहीं गुम गया है। जिस किसी सज्जन को यह सामान मिले, कृपया मुझ तक पहुँचाने का कष्ट करे।

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संदेश

मुझे याद है वह संदेश -
'बुरा न सुनो, बुरा न कहो, बुरा न देखो!'

लेकिन...उनके कुकृत्य देख
कैसे अनदेखा करूं?

कोई 'निर्भया' पुकारे
तो
क्या अनसुना करुं?

जब अतिक्रमण हो, 
उत्पीड़न हो,
और.... 
'तुम्हारा कहा' भी गांठ बंधा हो, पर
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ज़िंदगी

लाचारी है,
बीमारी है,
...फिर भी
ज़िंदगी सभी को प्यारी है!

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जन्म-दिन

यूँ तो जन्म-दिन मैं यूँ भी नहीं मनाता
पर इस बार...
जन्म-दिन बहुत रुलाएगा
जन्म-दिन पर 'माँ' बहुत याद आएगी
चूँकि...
इस बार...
'जन्म-दिन मुबारक' वाली चिरपरिचित आवाज नहीं सुन पाएगी...
पर...जन्म-दिन के आस-पास या शायद उसी रात...
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रिश्ते

कुछ खून से बने हुए
कुछ आप हैं चुने हुए
और कुछ...
हमने बचाए हुए हैं
टूटने-बिखरने को हैं..
बस यूं समझो..
दीवार पर टंगें कैलंडर की तरह,
सजाए हुए हैं।

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मदर'स डे

'आप 'मदर'स डे' को क्या करते हैं?'

'कुछ नहीं।'

'अरे?' मेरे ग़ैर-भारतीय मित्र ने आश्चर्य प्रकट किया।

'देखो रिचर्ड, हम भारतीयों के लिए हर दिन ही 'मदर'स डे' होता है। फिर 'मदर'स डे' का हमारे लिए औचित्य?"

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लायक बच्चे

अकेली माँ ने उन पाँच बच्चों की परवरिश करके उन्हें लायक बनाया। पांचों अपने पाँवों पर खड़े थे।

उनको खड़ा करते-करते माँ बैठ गई थी पर उसे खड़ा करने को कोई नहीं था।  माँ ने एक आधा नालायक़ पैदा किया होता तो शायद आज साथ होता पर लायक बच्चे तो बहुत व्यस्त हो चुके थे।
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रोहित कुमार 'हैप्पी' के दोहे

रोहित कुमार 'हैप्पी' के दोहों का संकलन।

दोहा, मात्रिक अर्द्धसम छंद है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) में 13-13 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के आदि में जगण (। ऽ।) नहीं होना चाहिए। सम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा होना आवश्यक माना गया है।

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सर एडमंड हिलेरी से साक्षात्कार

[सर एडमंड हिलेरी ने 29 मई 1953 को एवरेस्ट विजय की थी। आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन 2007 को उनसे हुई बातचीत के अंश आपके लिए यहाँ पुन: प्रकाशित किए जा रहे है]

सर एडमंड हिलेरी निसंदेह 87 वर्षीय वृद्ध हो गए हैं फिर भी उनका हौंसला आज भी माउंट एवरेस्ट की तरह अडिग है। शेरपा तेनज़िंग नोर्गे के साथ 1953 में एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करने वाले न्यूज़ीलैंड निवासी एडमंड हिलेरी का कदम 8850 मीटर ऊँचे एवरेस्ट पर किसी मानव का पहला कदम माना जाता है। हिलेरी सारी दुनिया के हीरो हैं परन्तु वे स्वयं को किसी प्रकार से हीरो न मानकर एक साधारण व्यक्ति मानते हैं।

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मायने रखता है ज़िंदगी में

किसी का आना
किसी का चले जाना
मायने रखता है ज़िंदगी में।

किसी का जगना
किसी का सोना
मायने रखता है ज़िंदगी में।

किसी की सुनना
किसी को सुनाना
मायने रखता है ज़िंदगी में।

किसी का हँसाना
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