पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है। - अज्ञात।

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मृदुला गर्ग | Mridula Garg

मृदुला गर्ग (Mridula Garg) हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय लेखिकाओं में से एक हैं।

आपका जन्म  25 अक्तूबर, 1938 कोलकाता में हुआ।

मृदुला जी ने अर्थशास्त्र में एम. ए किया किंतु आपका रुझान हिंदी महिंदी साहित्य में रहा ।

कुछ प्रमुख कृतियाँ:

कठगुलाब, चित्तकोबरा, उसके हिस्से की धूप, अनित्य, मैं और मैं (सभी उपन्यास) कहानियाँ और निबन्ध भी।

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यहाँ क्षण मिलता है
हम सताए, खीजे, उकताए, गड्ढों-खड्ढों, गंदे परनालों से बचते, दिल्ली की सड़क पर नीचे ज़्यादा, ऊपर कम देखते चले जा रहे थे, हर दिल्लीवासी की तरह, रह-रहकर सोचते कि हम इस नामुराद शहर में रहते क्यों हैं ? फिर करिश्मा ! एक नज़र सड़क से हट दाएँ क्या गई, ठगे रह गए। दाएँ रूख फलाँ-फलाँ राष्ट्रीय बैंक था। नाम के नीचे पट्ट पर लिखा था, यहाँ क्षण मिलता है। वाह ! बहिश्त उतर ज़मी पर आ लिया। यह कैसा बैंक है जो रोकड़ा लेने-देने के बदले क्षण यानी जीवन देता है? क्षण-क्षण करके दिन बनता है, दिन-दिन करके बरसों-बरस यानी ज़िंदगी। आह, किसी तरह एक क्षण और मिल जाए जीने को।
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