राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

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ग़ज़लें
ग़ज़ल क्या है? यह आलेख उनके लिये विशेष रूप से सहायक होगा जिनका ग़ज़ल से परिचय सिर्फ पढ़ने सुनने तक ही रहा है, इसकी विधा से नहीं। इस आधार आलेख में जो शब्‍द आपको नये लगें उनके लिये आप ई-मेल अथवा टिप्‍पणी के माध्‍यम से पृथक से प्रश्‍न कर सकते हैं लेकिन उचित होगा कि उसके पहले पूरा आलेख पढ़ लें; अधिकाँश उत्‍तर यहीं मिल जायेंगे। एक अच्‍छी परिपूर्ण ग़ज़ल कहने के लिये ग़ज़ल की कुछ आधार बातें समझना जरूरी है। जो संक्षिप्‍त में निम्‍नानुसार हैं: ग़ज़ल- एक पूर्ण ग़ज़ल में मत्‍ला, मक्‍ता और 5 से 11 शेर (बहुवचन अशआर) प्रचलन में ही हैं। यहॉं यह भी समझ लेना जरूरी है कि यदि किसी ग़ज़ल में सभी शेर एक ही विषय की निरंतरता रखते हों तो एक विशेष प्रकार की ग़ज़ल बनती है जिसे मुसल्‍सल ग़ज़ल कहते हैं हालॉंकि प्रचलन गैर-मुसल्‍सल ग़ज़ल का ही अधिक है जिसमें हर शेर स्‍वतंत्र विषय पर होता है। ग़ज़ल का एक वर्गीकरण और होता है मुरद्दफ़ या गैर मुरद्दफ़। जिस ग़ज़ल में रदीफ़ हो उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं अन्‍यथा गैर मुरद्दफ़।

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सफ़र में धूप तो होगी | ग़ज़ल - निदा फ़ाज़ली

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
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जाम होठों से फिसलते - शांती स्वरुप मिश्र

जाम होठों से फिसलते, देर नहीं लगती
किसी का वक़्त बिगड़ते, देर नहीं लगती
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काम बनता हुआ भी बिगड़े सब | ग़ज़ल - अंकुर शुक्ल 'अनंत'

काम बनता हुआ भी बिगड़े सब
अक़्ल पर पड़ गए हों पत्थर जब
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ये दुनिया तुम को रास आए तो कहना | ग़ज़ल - जावेद अख्तर

ये दुनिया तुम को रास आए तो कहना
न सर पत्थर से टकराए तो कहना
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ख़ुदा पर है यक़ीं जिसको | ग़ज़ल - निज़ाम फतेहपुरी

ख़ुदा पर है यक़ीं जिसको कभी दुख मे नहीं रोता
वही बढ़ता है आगे जो जवानी भर नहीं सोता
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गठरी में ज़रूरत का ही सामान रखियेगा | ग़ज़ल  - ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"

गठरी में ज़रूरत का ही सामान रखियेगा,
तुम सफ़र ज़िन्दगी का आसान रखियेगा।
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बात सच्ची कहो | ग़ज़ल - निज़ाम फतेहपुरी

बात सच्ची कहो पर अधूरी नहीं
लोग माने न माने ज़रूरी नहीं
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