हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

Find Us On:

English Hindi
Loading
ग़ज़लें
ग़ज़ल क्या है? यह आलेख उनके लिये विशेष रूप से सहायक होगा जिनका ग़ज़ल से परिचय सिर्फ पढ़ने सुनने तक ही रहा है, इसकी विधा से नहीं। इस आधार आलेख में जो शब्‍द आपको नये लगें उनके लिये आप ई-मेल अथवा टिप्‍पणी के माध्‍यम से पृथक से प्रश्‍न कर सकते हैं लेकिन उचित होगा कि उसके पहले पूरा आलेख पढ़ लें; अधिकाँश उत्‍तर यहीं मिल जायेंगे। एक अच्‍छी परिपूर्ण ग़ज़ल कहने के लिये ग़ज़ल की कुछ आधार बातें समझना जरूरी है। जो संक्षिप्‍त में निम्‍नानुसार हैं: ग़ज़ल- एक पूर्ण ग़ज़ल में मत्‍ला, मक्‍ता और 5 से 11 शेर (बहुवचन अशआर) प्रचलन में ही हैं। यहॉं यह भी समझ लेना जरूरी है कि यदि किसी ग़ज़ल में सभी शेर एक ही विषय की निरंतरता रखते हों तो एक विशेष प्रकार की ग़ज़ल बनती है जिसे मुसल्‍सल ग़ज़ल कहते हैं हालॉंकि प्रचलन गैर-मुसल्‍सल ग़ज़ल का ही अधिक है जिसमें हर शेर स्‍वतंत्र विषय पर होता है। ग़ज़ल का एक वर्गीकरण और होता है मुरद्दफ़ या गैर मुरद्दफ़। जिस ग़ज़ल में रदीफ़ हो उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं अन्‍यथा गैर मुरद्दफ़।

Articles Under this Category

शहीर जलाली की दो ग़ज़लें  - शहीर जलाली

तन बेचते हैं, कभी मन बेचते हैं
दुल्हन बेचते हैं कभी बहन बेचते हैं
...

कभी घर में नहीं... - बसंत कुमार शर्मा

कभी घर में नहीं मिलता, कभी बाहर नहीं मिलता
यहाँ पर अब बुजुर्गों को, कहीं आदर नहीं मिलता

तरक्की हो गयी थोड़ी, सभी कुछ भूल जाता है
हुआ है मतलबी बेटा, कभी हँसकर नहीं मिलता

कभी भी आँख का पानी, न मरने दीजियेगा बस
नदी जब सूख जाती है, उसे सागर नहीं मिलता

थके हैं अनवरत चलकर, जहाँ आराम कर लें कुछ
न जाने क्यों उन्हें वो मील का पत्थर नहीं मिलता

भुलाकर सब गिले-शिकवे, कोई त्यौहार मन जाए
जिसे वो कह सकें अपना, उन्हें वो घर नहीं मिलता

न दिन में नींद आती है, न मिलता चैन रातों को
कभी खटिया नहीं मिलती, कभी बिस्तर नहीं मिलता

न दौलत की कमी कोई,ई न शोहरत की कोई इच्छा
घड़ी भर पास जो बैठे, कोई सहचर नहीं मिलता
...

बग़ैर बात कोई | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह

बग़ैर बात कोई किसका दुख बँटाता है
वो जानता है मुझे इसलिए रुलाता है
...

घर-सा पाओ चैन कहीं तो |ग़ज़ल  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

घर-सा पाओ चैन कहीं तो हमको भी बतलाना तुम
हमसा कोई और दिखे तो जरा हमें दिखलाना तुम
...

वो कभी दर्द का... - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek

वो कभी दर्द का चर्चा नहीं होने देता
अपने जख्मों का वो जलसा नहीं होने देता
...

जबसे लिबासे-शब्द मिले - दीपशिखा सागर

जबसे लिबासे-शब्द मिले दर्द को मेरे
ग़ज़लें हुईं गमों का हैं त्यौहार क्या करूँ
...

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश