कविताएं | Hindi Poems | Poetry
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।

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कविताएं
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विश्व-बोध - गौरीशङ्कर मिश्र ‘द्विजेन्द्र'

रचे क्या तूने वेद-पुराण,
नीति, दर्शन, ज्योतिष, विज्ञान,
निखिल शास्रों के विविध-विधान,
छन्द, रूपक, कविता, आख्यान;
हृदय की जो न हुई पहचान !
जगत् ! धिक् तेरे ये सब ज्ञान !!
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खड़ा हिमालय बता रहा है - सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो न आंधी पानी में।
खड़े रहो तुम अविचल हो कर
सब संकट तूफानी में।

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हिंदी रूबाइयां - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

 
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तीन कवितायें - प्रदीप मिश्र

हमारे समय का फ़लसफ़ा
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दो कवितायें - दिव्यदीप सिंह

चलो बहुत हुआ अँधेरा सबेर देखते है
जितनी भी है ख़ुशी उसमें कुबेर देखते है।
निराशा की धार में तिनका लूटते है
सहारा मिला तो कुछ मन का ढूंढते है।

किससे कहोगे की क्या थी कमी
कितनी है रेत और कितनी नमी।
बहुत हुआ पतझड़ अब सावन देखते है
मन की ही गंगा में नहावन देखते है।
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समय - हर्षवर्धन व्यास

समय समय पर समय समझकर समय काटना होता है
समय के आगे समय के पीछे कभी भागना होता है
समय बदलता मानव की हर आशंका की परिभाषा
समय बदलता जीवन की है जीवन से जो अभिलाषा
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भविष्य कहीं गया  - कुसुम दादसेना

था एक जोड़ा, किया था उन्होने प्रेम विवाह 
पर उनकी जिंदगी हो गई तबाह
पैदा किए उन्होंने बच्चे दो
पर उनका भविष्य कहीं गया है खो
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तीन कविताएं - संतोष कुमार “गौतम”

डरे हुए लोग
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तुम्हें याद है ? - यतेन्द्र कुमार

तुम्हें याद है ? नाम लिखा था तुमने मेरा नदी किनारे,
एक साँझ अपनी उँगली से भीगे हुए रेत के ऊपर :
जिसको थोड़ी देर बाद ही मिटा दिया लहरों ने आकर,
देख जिसे, जाने क्यों उस क्षण, भर आये यों नयन तुम्हारे ?
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दो बजनिए | कविता - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

"हमारी तो कभी शादी ही न हुई,
न कभी बारात सजी,
न कभी दूल्‍हन आई,
न घर पर बधाई बजी,
हम तो इस जीवन में क्‍वांरे ही रह गए।"
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वसन्त आया - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

सखि, वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अञ्चल
पृथ्वी का लहराया।

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महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति - केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal

महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति

कवि! वह कविता जिसे छोड़ कर
चले गए तुम, अब वह सरिता
काट रही है प्रान्त-प्रान्त की
दुर्दम कुण्ठा--जड़ मति-कारा
मुक्त देश के नवोन्मेष के
जनमानस की होकर धारा।

काल जहाँ तक प्रवहमान है
और जहाँ तक दिक-प्रमान है
गए जहाँ तक वाल्मीकि हैं
गए जहाँ तक कालिदास हैं
वहाँ-दूर तक प्रवहमान है
आँसू-आह-गीत की धारा
तुमने जिसको आयुदान दी
और जिसका रूप सँवारा।
आज तुम्हारा जन्म-दिवस है
कवि, यह भारत चिरकृतज्ञ है।

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