हिंदी काव्य | Hindi Poetry | Hindi Poet | Hindi Poems | हिंदी दोहे, कविता, ग़ज़ल, गीत | Hindi literature

मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। - राहुल सांकृत्यायन।

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काव्य
जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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दो ग़ज़लें  - डॉ भावना

पर्वत पिघल गया तो पानी को आन क्यूँ है?
गुमसुम नदी के भीतर ऐसा उफान क्यूँ है?
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ग़ज़ल  - शुकदेव पटनायक 'सदा'

प्यासी धरा और खेत पर मैं गीत लिक्खूंगा
अब सत्य के संकेत पर मैं गीत लिक्खूंगा
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ग़ज़ल  - गौरव सक्सेना

हलक में अब साँस भी फंसने लगी है
चोट कोई फिर कहीं रिसने लगी है।
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ग़ज़ल - अमन का फ़रमान  - अफरंग

अमन का और मोहब्बत का ना तू फ़रमान बन पाया,
तू दुनिया में बना क्या-क्या; ना एक इंसान बन पाया|
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उड़ान - राज हंस गुप्ता

ऊँचे नील गगन के वासी, अनजाने पहन पाहुन मधुमासी,
बादल के संग जाने वाले,
पंछी रे, दो पर दे देना !
सीमाओं में बंदी हम, अधरों पीते पीड़ा का तम:
तुम उजियारे के पंथी, मेरी अंधियारी राह अगम!
बांहों पर मोती बिखराए, आँखों पर किरणें छितराए,
ऊषा के संग आने वाले
पंछी रे, दो पर दे देना !
तुमसे तो बंधन अनजाने, तुम्हें कौन-से देस बिराने?
मैं बढूं जिधर उधर झेलूं अवरोधक जाने पहचाने|
अधरों पर मधुबोल संजोये, पावनता में प्राण भिगोये,
मुक्ति-गान सुनाने वाले
पंछी रे, दो पर दे देना !

- राज हंस गुप्ता
[email protected]
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हिंदी रूबाइयां - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

 
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खड़ा हिमालय बता रहा है - सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो न आंधी पानी में।
खड़े रहो तुम अविचल हो कर
सब संकट तूफानी में।

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दोहा संग्रह - गीता प्रेस

दोहा-संग्रह
चार वेद षट शास्त्र में, बात मिली हैं दोय ।
दुख दीने दुख होत है, सुख दीने सुख होय ॥ १ ॥

ग्रंथ पंथ सब जगतके, बात बतावत तीन ।
राम हृदय, मनमें दया, तन सेवा में लीन ॥ २ ॥

तन मन धन दै कीजिये, निशिदिन पर उपकार।
यही सार नर देहमें, वाद-विवाद बिसार ॥ ३ ॥

चींटीसे हस्ती तलक, जितने लघु गुरु देह।
सबकों सुख देबो सदा, परमभक्ति है येह ॥ ४ ॥

काम क्रोध अरु लोभ मद, मिथ्या छल अभिमान ।
इनसे मनकों रोकिबो, साँचों व्रत पहिचान ॥ ५ ॥

श्वास श्वास भूले नहीं, हरिका भय अरु प्रेम।
यही परम जय जानिये, देत कुशल अरु क्षेम ॥ ६ ॥
 
मान धाम धन नारिसुत, इनमें जो न असक्तः ।
परमहंस तिहिं जानिये, घर ही माहिं विरत ॥ ७ ॥

प्रेिय भाषण पुनि नम्रता, आदर प्रीति विचार।
लज्जा क्षमा अयाचना, ये भूषण उर धार ॥ ८ ॥

शीश सफल संतनि नमें, हाथ सफल हरि सेव।
पाद सफल सतसंग गत, तव पावै कछु मेव ॥ ९ ॥

तनु पवित्र सेवा किये, धन पवित्र कर दान ।
मन पवित्र हरिभजन कर, हॉट त्रिविधि कल्यान  ॥ १० ॥

[ दोहा-संग्रह, गीता प्रेस, गोरखपुर ]
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दो ग़ज़लें  - अंकित

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं​;​
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं​;​
​​
​​पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है​;​
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं​;​​
​​
​​वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से​;​
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं​;​
​​
​​चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब​;​
सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम हैं​;​।
...

विश्व-बोध - गौरीशङ्कर मिश्र ‘द्विजेन्द्र'

रचे क्या तूने वेद-पुराण,
नीति, दर्शन, ज्योतिष, विज्ञान,
निखिल शास्रों के विविध-विधान,
छन्द, रूपक, कविता, आख्यान;
हृदय की जो न हुई पहचान !
जगत् ! धिक् तेरे ये सब ज्ञान !!
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तीन कवितायें - प्रदीप मिश्र

हमारे समय का फ़लसफ़ा
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दो ग़ज़लें  - अजय अज्ञात

पिता के दक्ष हाथों ने मुझे साँचे में ढाला है
मुझे कुलदीप बन घर में सदा करना उजाला है
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दो ग़ज़लें  - सुनीता काम्बोज

1)
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भविष्य कहीं गया  - कुसुम दादसेना

था एक जोड़ा, किया था उन्होने प्रेम विवाह 
पर उनकी जिंदगी हो गई तबाह
पैदा किए उन्होंने बच्चे दो
पर उनका भविष्य कहीं गया है खो
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तीन कविताएं - संतोष कुमार “गौतम”

डरे हुए लोग
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तुम्हें याद है ? - यतेन्द्र कुमार

तुम्हें याद है ? नाम लिखा था तुमने मेरा नदी किनारे,
एक साँझ अपनी उँगली से भीगे हुए रेत के ऊपर :
जिसको थोड़ी देर बाद ही मिटा दिया लहरों ने आकर,
देख जिसे, जाने क्यों उस क्षण, भर आये यों नयन तुम्हारे ?
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दो कवितायें - दिव्यदीप सिंह

चलो बहुत हुआ अँधेरा सबेर देखते है
जितनी भी है ख़ुशी उसमें कुबेर देखते है।
निराशा की धार में तिनका लूटते है
सहारा मिला तो कुछ मन का ढूंढते है।

किससे कहोगे की क्या थी कमी
कितनी है रेत और कितनी नमी।
बहुत हुआ पतझड़ अब सावन देखते है
मन की ही गंगा में नहावन देखते है।
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समय - हर्षवर्धन व्यास

समय समय पर समय समझकर समय काटना होता है
समय के आगे समय के पीछे कभी भागना होता है
समय बदलता मानव की हर आशंका की परिभाषा
समय बदलता जीवन की है जीवन से जो अभिलाषा
...

ग़ज़ल  - शशिकान्त मिश्रा

क्यों भूल गए हमको रिश्ता तो पुराना था,
एक ये भी ज़माना है, एक वो भी ज़माना था!
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गीत और गीतिका  - सुनीता काम्बोज

गीत
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आदमी की वंदना करो - डॉ नथमल झँवर

सब प्रसन्न हों, ना कोई भी उदास हो आशावादी हों, ना कोई भी निराश हो
देश हित जिए, मरें भी देश के लिए ये तम न हो कहीं भी, सूर्य सा प्रकाश हो
दुश्मनों के आगे कभी शीश ना झुके देशहित बढ़े कदम, कभी भी ना रुकें
यह कदम बढ़ें तो सिर्फ देश के लिए शीश गर चढ़े तो सिर्फ देश के लिए
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कबीर की ज्ञान, भक्ति और नीति साखियाँ - कबीरदास | Kabirdas

यहाँ कबीर की ज्ञान, भक्ति और नीति के विषयों से सम्बद्ध साखियाँ संकलित हैं। इनमें आत्मा की अमरता, संसार की असारता, गुरु की महिमा तथा दया, सन्तोष और विनम्रता जैसे सद्गुणों पर बल दिया गया है।
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विनोद कुमार दवे के हाइकु - विनोद कुमार दवे

1.
जिंदगी चाक
हम कच्ची मिट्टी है
दर्द कुम्हार
...

पर्यावरण पर हाइकु  - लाल बिहारी लाल


1)
संकट भारी
प्रदूषण का जोर
प्रकृति हारी ।।
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माँ पर कुछ हाइकु  - राजीव गोयल

1)
...

कुछ हाइकु - मनीषा सक्सेना

1)
मित्र हैं वही
जो न तोड़े विश्वास
शेष तो साथी


2)
निराश न हों
असफलता देती
प्रेरणा नई


3)
धन प्राप्ति से
दरिद्रता न मिटे
वित्तेष्णा  छोड़ो
...

काका हाथरसी की कुंडलियाँ - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi

पत्रकार दादा बने, देखो उनके ठाठ।
कागज़ का कोटा झपट, करें एक के आठ।।
करें एक के आठ, चल रही आपाधापी ।
दस हज़ार बताएं, छपें ढाई सौ कापी ।।
विज्ञापन दे दो तो, जय-जयकार कराएं।
मना करो तो उल्टी-सीधी न्यूज़ छपाएं ।।
...

दो बजनिए | कविता - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

"हमारी तो कभी शादी ही न हुई,
न कभी बारात सजी,
न कभी दूल्‍हन आई,
न घर पर बधाई बजी,
हम तो इस जीवन में क्‍वांरे ही रह गए।"
...

वसन्त आया - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

सखि, वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अञ्चल
पृथ्वी का लहराया।

...

आराम करो | हास्य कविता - गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas

एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।"
हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।
...

महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति - केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal

महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति

कवि! वह कविता जिसे छोड़ कर
चले गए तुम, अब वह सरिता
काट रही है प्रान्त-प्रान्त की
दुर्दम कुण्ठा--जड़ मति-कारा
मुक्त देश के नवोन्मेष के
जनमानस की होकर धारा।

काल जहाँ तक प्रवहमान है
और जहाँ तक दिक-प्रमान है
गए जहाँ तक वाल्मीकि हैं
गए जहाँ तक कालिदास हैं
वहाँ-दूर तक प्रवहमान है
आँसू-आह-गीत की धारा
तुमने जिसको आयुदान दी
और जिसका रूप सँवारा।
आज तुम्हारा जन्म-दिवस है
कवि, यह भारत चिरकृतज्ञ है।

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