राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

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लघु-कथाएं
लघु-कथा, 'गागर में सागर' भर देने वाली विधा है। लघुकथा एक साथ लघु भी है, और कथा भी। यह न लघुता को छोड़ सकती है, न कथा को ही।

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दो लघु-कथाएँ - बृजेश नीरज

बंदर

आज़ादी के समय देश में हर तरफ दंगे फैले हुए थे। गांधी जी बहुत दुखी थे। उनके दुख के दो कारण थे - एक दंगे, दूसरा उनके तीनों बंदर खो गए थे। बहुत तलाश किया लेकिन वे तीन न जाने कहां गायब हो गए थे।

एक दिन सुबह अपनी प्रार्थना सभा के बाद गांधी जी शहर की गलियों में घूम रहे थे कि अचानक उनकी निगाह एक मैदान पर पड़ी, जहां बंदरों की सभा हो रही थी।

उत्सुकतावश गांधीजी करीब गए। उन्होंने देखा कि उनके तीनों बंदर मंचासीन हैं। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। प्रसन्न मन वे उन तीनों के पास पहुंचे।

गांधीजी, 'अरे तुम लोग कहां चले गए थे, मैंने तुम तीनों को कितना ढूंढा? यहां क्या कर रहे हो?'

बंदर बोले, 'गांधीजी, हम लोगों ने आपको और आपके सिद्धान्त दोनों को त्याग दिया है। यह हमारी पार्टी की पहली सभा है। देश आजाद हो गया। अब आपकी और आपके सिद्धान्तों की देश को क्या जरूरत?'

गांधी जी हतप्रभ से खड़े रह गए।

आज भी खड़े हैं ठगे से, मूक इस देश में हो रहा तमाशा देखते।
अपने शहर में ढूंढिएगा कहीं न कहीं मिल जाएंगे मूर्तिवत खड़े हुए।

- बृजेश नीरज


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फर्ज | लघुकथा  - सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

"अशरफ मियाँ कहाँ थे आप ?"

"कहाँ थे आप ! मैं समझा नहीं सर ?"

"अशरफ मियाँ इ.ओ. सर ने औचक निरीक्षण किया तो आपकी क्लास खाली पड़ी थी। बच्चे धमाचौकड़ी मचा रहे थे
"

"सर, आप भी बच्चों जैसी बातें कर रहे हैं ! क्लास के चक्क्रर में हम अपनी इबादत जैसी जरूरी आजमाइशें छोड़ दें क्या ?"

"कमाल है अशरफ साहब, क्या आप नहीं जानते कि क्लास खाली हो तो बच्चे बातों-बातों में आपस में किसी का सर भी फोड़ सकते हैं?"

"सर जी, अगर मामला इतना संजीदा है तो स्कूल का हेड होने के नाते इसकी फ़िकर आपको करनी चाहिए
मैं अपनी इबादत का टाइम किसी को नहीं दे सकता भले ही कुछ भी हो जाए"

"ठीक है अब तो चले जाओ क्लास में
"

"पापा ! जल्दी घर चलिए, भाई जान घर में बैठे हैं और लगातार रोये चले जा रहे हैं
किसी के चुप कराये नहीं मान रहे" अशरफ सर का बेटा उन्हें पुकारता हुआ बदहवास स्कूल के अंदर आ गया

"अकीब लगातार रोये चले जा रहा है!  क्यों क्या हुआ ?"

"पता नहीं पापा, भाई जान कुछ बताएं तब न!"

"कुछ तो कहता होगा
आखिर हुआ क्या ?"

"लगता है उनकी नौकरी छूट गयी है
"
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अनशन | लघु कथा  - डॉ. पूरन सिंह

अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के विरोध में अनशन जारी था। वे और उनकी कम्पनी लोकपाल बिल लाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के लिए जमीन आसमान एक किए दे रहे थे। मुझे उनकी बात ठीक लगी इसीलिए मैं उनसे मिलना चाहता था । विशाल भीड़ में उन तक पहुंचना मुश्किल था । उनके समर्थक ब्लैक कैट कमांडो की तरह उनके आस-पास मंडरा रहे थे । अब एैसे में उनसे कैसे मिला जाए, मैं सोच रहा था।
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महीने के आख़री दिन  - राकेश पांडे

महीने के आख़री दिन थे। मेरे लिए तो महीने का हर दिन एक सा होता है। कौन सी मुझे तनख़्वाह मिलती है?  आई'म नोट एनिवन'स सर्वेंट! (I'm not anyone's servant!) राइटर हूँ।  खुद लिखता हूँ और उसी की कमाई ख़ाता हू। अफ़सोस सिर्फ़ इतना है, कमाई होती ही नही। मैने सुना है की ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी बूंरंगस (boomerangs) यूज़  करते हैं, शिकार के लिए. जो के फेंकने के बाद वापस आ जाता है. मेरी रचनायें उस बूंरंग को भी शर्मिंदा कर देंगी। इस रफ़्तार से वापस आती हैं।

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दृष्टि - रोहित कुमार 'हैप्पी'

रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क के किनारे कटोरा लिए एक भिखारी लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने कटोरे में पड़ी रेज़गारी को हिलाता रहता और साथ-साथ यह गाना भी गाता जाता -
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यह भी नशा, वह भी नशा | लघुकथा  - मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

होली के दिन राय साहब पण्डित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग छन रही थी कि सहसा मालूम हुआ, जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हैं। बुल साहब बहुत ही मिलनसार आदमी थे और अभी हाल ही में विलायत से आये थे। भारतीय रीति-नीति के जिज्ञासु थे, बहुधा मेले-ठेलों में जाते थे। शायद इस विषय पर कोई बड़ी किताब लिख रहे थे। उनकी खबर पाते ही यहाँ बड़ी खलबली मच गयी। सब-के-सब नंग-धड़ंग, मूसरचन्द बने भंग छान रहे थे। कौन जानता था कि इस वक्त साहब आएंगे। फुर-से भागे, कोई ऊपर जा छिपा, कोई घर में भागा, पर बिचारे राय साहब जहाँ के तहाँ निश्चल बैठे रह गये। आधा घण्टे में तो आप काँखकर उठते थे और घण्टे भर में एक कदम रखते थे, इस भगदड़ में कैसे भागते। जब देखा कि अब प्राण बचने का कोई उपाय नहीं है, तो ऐसा मुँह बना लिया मानो वह जान बूझकर इस स्वदेशी ठाट से साहब का स्वागत करने को बैठे हैं। साहब ने बरामदे में आते ही कहा-हलो राय साहब, आज तो आपका होली है?
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