हिंदी काव्य | Hindi Poetry | Hindi Poet | Hindi Poems | हिंदी दोहे, कविता, ग़ज़ल, गीत | Hindi literature
समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है। -सर जार्ज ग्रियर्सन।

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काव्य
जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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मैं तो वही खिलौना लूँगा - सियाराम शरण गुप्त | Siyaram Sharan Gupt
'मैं तो वही खिलौना लूँगा'
मचल गया दीना का लाल -
'खेल रहा था जिसको लेकर
राजकुमार उछाल-उछाल ।'

व्यथित हो उठी माँ बेचारी -
'था सुवर्ण - निर्मित वह तो !
खेल इसी से लाल, - नहीं है
राजा के घर भी यह तो ! '

राजा के घर ! नहीं नहीं माँ
तू मुझको बहकाती है ,
इस मिट्टी से खेलेगा क्यों
राजपुत्र तू ही कह तो । '

फेंक दिया मिट्टी में उसने
मिट्टी का गुड्डा तत्काल ,
'मैं तो वही खिलौना लूँगा' -
मचल गया दीना का लाल

' मैं तो वही खिलौना लूँगा '
मचल गया शिशु राजकुमार , -
वह बालक पुचकार रहा था
पथ में जिसको बारबार |

' वह तो मिट्टी का ही होगा ,
खेलो तुम तो सोने से '
दौड़ पड़े सब दास - दासियाँ
राजपुत्र के रोने से

' मिट्टी का हो या सोने का ,
इनमें वैसा एक नहीं ,
खेल रहा था उछल - उछल कर
वह तो उसी खिलौने से '

राजहठी ने फेंक दिए सब
अपने रजत - हेम - उपहार ,
' लूँगा वही , वही लूँगा मैं ! '
मचल गया वह राजकुमार

- सियारामशरण गुप्त

[ साभार - जीवन सुधा ]

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आपकी हँसी  - रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay


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राष्ट्रगीत में भला कौन वह - रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मख़मल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब-पच्छिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन-
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।

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जितना कम सामान रहेगा - गोपालदास ‘नीरज’

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
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मुक्तिबोध की हस्तलिपि में कविता - गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh


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मुक्तिबोध की कविता - गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh

मैं बना उन्माद री सखि, तू तरल अवसाद
प्रेम - पारावार पीड़ा, तू सुनहली याद
तैल तू तो दीप मै हूँ, सजग मेरे प्राण।
रजनि में जीवन-चिता औ' प्रात मे निर्वाण
शुष्क तिनका तू बनी तो पास ही मैं धूल
आम्र में यदि कोकिला तो पास ही मैं हूल
फल-सा यदि मैं बनूं तो शूल-सी तू पास
विँधुर जीवन के शयन को तू मधुर आवास
सजल मेरे प्राण है री, सजग मेरे प्राण
तू बनी प्राण! मै तो आलि चिर-म्रियमाण।

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आदमी आदमी को क्‍या देगा | ग़ज़ल - सुदर्शन फ़ाकिर

आदमी आदमी को क्‍या देगा
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा

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कुँअर बेचैन की ग़ज़लें  - कुँअर बेचैन

दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए
सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए

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चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम | गीत - रमाकांत अवस्थी

चन्द्रमा की चाँदनी से भी नरम
और रवि के भाल से ज्यादा गरम
है नहीं कुछ और केवल प्यार है

               ढूँढने को मैं अमृतमय स्वर नया
               सिन्धु की गहराइयों में भी गया
               मृत्यु भी मुझको मिली थी राह पर
               देख मुझको रह गई थी आह भर

मृत्यु से जिसका नहीं कुछ वास्ता
मुश्किलों को जो दिखाता रास्ता
वह नहीं कुछ और केवल प्यार है

               जीतने को जब चला संसार मैं
               और पहुँचा
जब प्रलय के द्वार मैं
               बह रही थी रक्त की धारा वहाँ
               थे नहाते अनगिनत मुर्दे जहाँ

रक्त की धारा बनी जल, छू जिसे
औे मुर्दों ने कहा जीवन जिसे
वह नही कुछ और केवल प्यार है

                मन हुआ मेरा कि ईश्वर से कहूँ
                दूर तुमसे और कितने दिन रहूँ
                देखकर मुझको हँसी लाचारियाँ
                और दुनियाँ ने बजाई तालियाँ

पत्थरो को जो बनाता देवता
जानती दुनिया नहीं जिसका पता
वह नहीं कुछ और केवल प्यार है

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दो बजनिए | कविता - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

"हमारी तो कभी शादी ही न हुई,
न कभी बारात सजी,
न कभी दूल्‍हन आई,
न घर पर बधाई बजी,
हम तो इस जीवन में क्‍वांरे ही रह गए।"
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फूल और काँटा | Phool Aur Kanta - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh

हैं जनम लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता।
रात में उन पर चमकता चांद भी,
एक ही सी चांदनी है डालता।।

मेह उन पर है बरसता एक-सा,
एक-सी उन पर हवाएं हैं बहीं।
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक-से होते नहीं।।

छेद कर कांटा किसी की उंगलियां,
फाड़ देता है किसी का वर वसन।
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भौंरें का है बेध देता श्याम तन।।

फूल लेकर तितलियों को गोद में,
भौंरें को अपना अनूठा रस पिला।
निज सुगंधों औ निराले रंग से,
है सदा देता कली जी की खिला।।

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प्रतिपल घूंट लहू के पीना | ग़ज़ल - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'

प्रतिपल घूँट लहू के पीना,
ऐसा जीवन भी क्या जीना ।

बहुत सरल है घाव लगाना,
बहुत कठिन घावों का सीना ।

छेड़ गया सोई यादों को,
सावन का मदमस्त महीना ।

पीठ न वीर दिखाते रण में,
छलनी भी हो जाये सीना ।

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यक्ष प्रश्न - अटल बिहारी वाजपेयी की कविता - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee


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कैदी कविराय की कुंडलिया  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee



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ऊँचाई | कविता - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
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विप्लव-गान | बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ - बालकृष्ण शर्मा नवीन | Balkrishan Sharma Navin

कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये,
एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये,
प्राणों के लाले पड़ जायें त्राहि-त्राहि स्वर नभ में छाये,
नाश और सत्यानाशों का धुआँधार जग में छा जाये,
बरसे आग, जलद जल जाये, भस्मसात् भूधर हो जाये,
पाप-पुण्य सद्-सद् भावों की धूल उड़ उठे दायें-बायें,
नभ का वक्षस्थल फट जाये, तारे टूक-टूक हो जायें,
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये!
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आराम करो | हास्य कविता - गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas

एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।"
हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।
...

आज मेरे आँसुओं में, याद किस की मुसकराई? | गीत - उपेन्द्रनाथ अश्क | Upendranath Ashk

आज मेरे आँसुओं में, याद किस की मुसकराई?
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उसने मेरा हाथ देखा | कविता - उपेन्द्रनाथ अश्क | Upendranath Ashk

उसने मेरा हाथ देखा और सिर हिला दिया,
"इतनी भाव प्रवीणता
दुनियां में कैसे रहोगे!
इसपर अधिकार पाओ,
वरना
लगातार दुख दोगे
निरंतर दुख सहोगे!"

यह उधड़े मांस सा दमकता अहसास,
मै जानता हूँ, मेरी कमज़ोरी है
हल्की सी चोट इसे सिहरा देती है
एक टीस है, जो अन्तरतम तक दौड़ती चली जाती है
दिन का चैन और रातों की नींद उड़ा देती है!
पर यही अहसास मुझे ज़िन्दा रखे है,
यही तो मेरी शहज़ोरी है!
वरना मांस जब मर जाता है,
जब खाल मोटी होकर ढाल बन जाती है,
हल्का सा कचोका तो दूर, आदमी गहरे वार
बेशर्मी से हँसकर सह जाता है,
जब उसका हर आदर्श दुनिया के साथ
चलने की शर्त में ढल जाता है
जब सुख सुविधा और संपदा उसके पांव चूमते हैं
वह मज़े से खाता-पीता और सोता है
तब यही होता है:  सिर्फ
कि वह मर जाता है!

वह जानता नहीं, लेकिन
अपने कंधों पर अपना शव
आप ढोता है।
                         

...

क्योंकि सपना है अभी भी - धर्मवीर भारती | Dhramvir Bharti

...क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी

...

बाबा | हास्य कविता - रोहित कुमार 'हैप्पी'

दूर बस्ती से बाहर
बैठा था एक फ़क़ीर
पेट से भूखा था
तन कांटे सा सूखा था।
...

उसे कुछ मिला, नहीं ! - रोहित कुमार 'हैप्पी'

कूड़े के ढेर से
...

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