बाल साहित्य | बाल कहानियां | बाल कविताएं | Children's Hindi Literature
हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

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बाल-साहित्य
बाल साहित्य के अन्तर्गत वह शिक्षाप्रद साहित्य आता है जिसका लेखन बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर किया गया हो। बाल साहित्य में रोचक शिक्षाप्रद बाल-कहानियाँ, बाल गीत व कविताएँ प्रमुख हैं। हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य की परम्परा बहुत समृद्ध है। पंचतंत्र की कथाएँ बाल साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। हिंदी बाल-साहित्य लेखन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। पंचतंत्र, हितोपदेश, अमर-कथाएँ व अकबर बीरबल के क़िस्से बच्चों के साहित्य में सम्मिलित हैं। पंचतंत्र की कहानियों में पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर बच्चों को बड़ी शिक्षाप्रद प्रेरणा दी गई है। बाल साहित्य के अंतर्गत बाल कथाएँ, बाल कहानियां व बाल कविता सम्मिलित की गई हैं।

Articles Under this Category

साखियाँ - कबीर

जाति न पूछो साध की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।।1।।

आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक।
कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक ।।2।।

माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि।
मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं ।।3।।

कबीर घास न नींदिए, जो पाऊँ तलि होइ।
उड़ि पड़ै जब आँखि मैं, खरी दुहेली होइ ।।4।।

जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होय।
या आपा को डारि दे, दया करै सब कोय ।।5।।

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चिट्ठी | बाल कविता - प्रकाश मनु | Prakash Manu

चिट्ठी में है मन का प्यार
चिट्ठी  है घर का अखबार
इस में सुख-दुख की हैं बातें
प्यार भरी इस में सौग़ातें
कितने दिन कितनी ही रातें
तय कर आई मीलों पार।

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स्कूल में लग जाये ताला | बाल कविता  - Jaiprakash Manas

अब से ऐसा ही हो जाये
भले किसी को पसंद न आये ...

स्कूल में लग जाये ताला
दें बस्तों को देश निकाला
होमवर्क जुर्म घोषित हो,
कोई परीक्षा ले न पाये ...

दिन भर केवल खेलें खेल
जो डाँटे उसको हो जेल
खट्टा-मीठा खारा-तीता,
जो चाहे जैसा वह खाये ...

हरदम चले हमारी सत्ता
हो दिल्ली चाहे कलकत्ता
हम मालिक अपनी मर्जी के,
हर गलती माँ-बाप को भाये ...

मौसी-मामी, नाना-नानी
रोज सुनायें नयी कहानी
हम पंछी हैं, हम तितली हैं,
गीत हमारा ही जग गाये ...

अब से ऐसा ही हो जाये
भले किसी को पंसद न आये ...

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वंदना | बाल कविता - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'

मैं अबोध सा बालक तेरा,
ईश्वर! तू है पालक मेरा ।

         हाथ जोड़ मैं करूँ वंदना,
         मुझको तेरी कृपा कामना ।

मैं हितचिंतन करूँ सभी का,
बुरा न चाहूँ कभी किसी का ।

         कभी न संकट से भय मानूँ,
         सरल कठिनताओं को जानूँ ।

प्रतिपल अच्छे काम करूँ मैं,
देश का ऊँचा नाम करूँ मैं ।

         दुखी जनों के दुःख हरूँ मैं,
         यथा शक्ति सब को सुख दूँ मैं ।

गुरु जन का सम्मान करूँ मैं,
नम्र, विनीत, सुशील बनूँ मैं ।
 
        मंगलमय हर कर्म हो मेरा,
        मानवता ही धर्म हो मेरा ।

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मैंने झूठ बोला था | बाल कथा - विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar

एक बालक था। नाम था उसका राम। उसके पिता बहुत बड़े पंडित थे। वह बहुत दिन जीवित नहीं रहे। उनके मरने के बाद राम की माँ अपने भाई के पास आकर रहने लगी। वह एकदम अनपढ़ थे। ऐसे ही पूजा-पाठ का ठोंग करके जीविका चलाते थे। वह झूठ बोलने से भी नहीं हिचकते थे।
वे पेशवा के राज में रहते थे। पेशवा विद्वानों का आदर करते थे। उन्हें वे दक्षिणा देते थे। वे विद्यार्थी को भी दक्षिणा देते थे। वे चाहते थे कि उनके राज में शिक्षा का प्रसार हो।

एक दिन बहुत से विद्वान पंडित और विद्यार्थी दक्षिणा लेने महल में पहुँचे। बड़े आदर से सूबेदार ने उन्हें बैठाया। उन्हीं में राम और उसके मामा भी थे। लेकिन वे न तो एक अक्षर पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे। राम बार-बार धीरे-धीरे मामा से कहता, ''मामा ! मैं तो घर जा रहा हूँ ।''

मामा हर बार डाँट देते, ''चुप रह ! जब से आया है टर-टर किए जा रहा है।''

राम कहता, ''नहीं मामा। मैं यहाँ नहीं बैठूँगा। मैं कहाँ पढ़ता हूँ। मैं झूठ नहीं बोलूँगा।''

राम जब नहीं माना तो मामा ने किचकिचाकर कहा, ''चुप नहीं रहेगा। झूठ नहीं बोलूँगा। हूँ ऊ...। जैसे सच बोलने का ठेका तेने ही तो ले रखा है। जानता है मैं दिन भर झूठ बोलता हूँ। कितनी बार झूठ बोलकर दक्षिणा ली। तू भी तो बार-बार झूठ बोलता है। नहीं बोलता ? सब इसी तरह कहते हैं। जो ये सब यहाँ खड़ें हैं ये सब क्या पढ़े हुए हैं।''

राम ने कहना चाहा, 'पर मामा...' लेकिन मामा ने उसे बोलने ही नहीं दिया। डपटकर बोला, ''अरे खड़ा भी रह। तेरे सत्य के लिए मैं घर आती लक्ष्मी नहीं लौटाऊँगा, समझे। पूरा एक रुपया मिलेगा एक चेराशाही बस, चुप खड़ा रह। बारी आने वाली है।''

तभी पेशवा के प्रतिनिधि आ पहुँचे। उनके बैठते ही सूबेदार ने विद्वानों की मंडली से कहा, ''कृपा करके आप एक-एक करके आते जाएँ और दक्षिणा लेते जाएँ। हाँ-हाँ, आप आइए, गंगाधर जी।''

गंगाधर जी आगे आए। सूबेदार ने उनका परिचय दिया, ''जी ये हैं श्रीमान गंगाधर शास्त्री। न्याय पढ़ाते हैं।''

पेशवा के प्रतिनिध ने उन्हें प्रणाम किया। दक्षिणा देते हुए बोले, ''कृपा कर यह छोटी-सी भेंट ग्रहण कीजिए और खूब पढ़ाइए।''

शास्त्री जी ने दक्षिणा लेकर पेशवा का जय-जयकार किया और उनकी कल्याण कामना करते हुए चले गए। फिर दूसरे आए, तीसरे आए। चौथे नम्बर पर राम के मामा थे। वे जब आगे बढ़े तो सूबेदार ने उन्हें ध्यान से देखा, कहा ''मैं आपको नहीं पहचान रहा आप कहाँ पढ़ाते हैं ?''

मामा अपना रटारटाया पाठ भूल चुके थे। 'मैं' 'मैं' करने लगे। प्रतिनिधि ने बेचैन होकर पूछा, ''आपका शुभ नाम क्या है ? क्या आप पढ़ाते हैं ? बताइए न।''

लेकिन मामा क्या बतावें ? इतना ही बोल पाए, ''मैं...मैं....जी मैं...जी मैं वहाँ।''

उनको इस तरह बौखलाते हुए देखकर सब लोग हँस पड़े। पेशवा के प्रतिनिधि ने कठोर होकर कहा, ''जान पड़ता है आप पढ़े-लिखे नहीं हैं। खेद है कि आजकल कुछ लोग इतने गिर गए हैं कि झूठ बोलकर दक्षिणा लेते हैं। आप ब्राह्मण हैं। आपको झूठ बोलना शोभा नहीं देता। आपको राजकोष से दक्षिणा नहीं मिल सकती पर जो माँगने आया है उसे निराश लौटाना भी अच्छा नहीं लगता। इसलिए मैं आपको अपने पास से भीख देता हूँ। जाइए।''

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कौआ और लोमड़ी - अज्ञात

क बार एक कौए को एक रोटी मिली। लोमड़ी ने सोचा क्यों न मैं इस कौए को मूर्ख बनाकर रोटी ले लूँ।

लोमड़ी बोली - कौए भाई तुम इतना अच्छा गाते हो! मुझे भी एक गाना सुनाओ।

कौए ने जैसे ही गाने के लिए मुँह खोला, रोटी नीचे गिर गई।

लोमड़ी रोटी लेकर चली गई।

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बाल-दिवस | कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections

भोले भाले बालक सारे। हैं चाचा नेहरू के प्यारे ।।
सूरज चन्दा बन कर चमकें-
दूर करें हम अंधियारो को।
नील गगन के आँचल से हम-
लाएँ चाँद सितारों को ।।
देश की नैया के बनें खिवैया-
हम भारत के कृष्ण कन्हैया ।।
अमन-चैन की सरिता बहाएँ-
भारत के हर घर हर द्वारे ।
भोले भाले बालक सारे। हैं चाचा नेहरूके प्यारे ।।

देशद्रोह गद्दारों को हम
-
वसुन्धरा से मिटाएँगे ।
राष्ट्र-प्रेम के मधुर गीत हम-
मिल जुल कर सब गाएँगे ।
वीर भरत बन जाएँगे हम-
शेरों को गोद खिलाएँगे ।
मातृ-भूमि पर नित बलि जाएँ-
शुभ पावन हों कर्म हमारे ।

भोले भाले बालक सारे। हैं चाचा नेहरू के प्यारे ।।

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पद - सूरदास

मैया, कबहि बढ़ैगी चोटी?
किती बार मोहि दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्नै है लाँबी-मोटी।
काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै, नागिनी सी भुइँ लोटी।
काँचौ दूध पियावत पचि-पचि, देति न माखन-रोटी।
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी।

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जैसा सवाल वैसा जवाब - भारत-दर्शन संकलन

बादशाह अकबर अपने मंत्री बीरबल को बहुत पसंद करता था। बीरबल की बुद्धि के आगे बड़े-बड़ों की भी कुछ नहीं चल पाती थी। इसी कारण कुछ दरबारी बीरबल से जलते थे। वे बीरबल को मुसीबत में फँसाने के तरीके सोचते रहते थे।

अकबर के एक खास दरबारी ख्वाजा सरा को अपनी विद्या और बुद्धि पर बहुत अभिमान था। बीरबल को तो वे अपने सामने निरा बालक और मूर्ख समझते थे। लेकिन अपने ही मानने से तो कुछ होता नहीं! दरबार में बीरबल की ही तूती बोलती और ख्वाजा साहब की बात ऐसी लगती थी जैसे नक्कारखाने में तूती की आवाज़। ख्वाजा साहब की चलती तो वे बीरबल को हिंदुस्तान से निकलवा देते लेकिन निकलवाते कैसे!

एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहतु सोचे -विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएँगे और वह लाख कोशिश करके भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाएगा। फिर बादशाह मान लेगा कि ख्वाजा सरा के आगे बीरबल कुछ नहीं है।

ख्वाजा साहब अचकन-पगड़ी पहनकर दाढ़ी सहलाते हुए अकबर के पास पहुँचे और सिर झुकाकर बोले, "बीरबल बड़ा बुद्धिमान बनता है। आप भी उसकी लंबी-चौड़ी बातों के धोखे में आ जाते हैं। मैं चाहता हूँ कि आप मेरे तीन सवालों के जवाब पूछकर उसके दिमाग की गहराई नाप लें। उस नकली अक्ल-बहादुर की कलई खुल जाएगी।

ख्वाजा के अनुरोध करने पर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उनसे कहा, "बीरबल! परम ज्ञानी ख्वाजा साहब तुमसे तीन प्रश्न पूछना चाहते हैं। क्या तुम उनके उत्तर दे सकोगे?"

बीरबल बोले, "जहाँपनाह! ज़रूर दूँगा। खुशी से पूछें।"

ख्वाजा साहब ने अपने तीनों सवाल लिखकर बादशाह को दे दिए।

अकबर ने बीरबल से ख्वाजा का पहला प्रश्न पूछा, "संसार का केंद्र
कहाँ है?"

बीरबल ने तुरंत ज़मीन पर अपनी छड़ी गाड़कर उत्तर दिया, "यही स्थान चारों ओर से दुनिया के बीचों-बीच पड़ता है। यदि ख्वाजा साहब को विश्वास न हो तो वे फ़ीते से सारी दुनिया को नापकर दिखा दें कि मेरी बात गलत है।"

अकबर ने दूसरा प्रश्न किया, "आकाश में कितने तारे हैं?"

बीरबल ने एक भेड़ मँगवाकर कहा, "इस भेड़ के शरीर में जितने बाल हैं, उतने ही तारे आसमान में हैं। ख्वाजा साहब को इसमें संदेह हो तो वे बालों को
गिनकर तारों की संख्या से तुलना कर लें।"

अब अकबर ने तीसरा सवाल किया, "संसार की आबादी कितनी है?"

बीरबल ने कहा, "जहाँपनाह! संसार की आबादी पल-पल पर घटती-बढ़ती रहती है क्योंकि हर पल लोगों का मरना-जीना लगा ही रहता है। इसलिए यदि
सभी लोगों को एक जगह इकट्ठा किया जाए तभी उनको गिनकर ठीक-ठीक संख्या बताई जा सकती है।"

बादशाह तो बीरबल के उत्तरों से संतुष्ट हो गया लेकिन ख्वाजा साहब नाक-भाैंह सिकोड़कर बोले, "ऐसे गोलमोल जवाबों से काम नहीं चलेगा जनाब!"

बीरबल बोले, "ऐसे सवालों के ऐसे ही जवाब होते हैं। पहले मेरे जवाबों को गलत साबित कीजिए, तब आगे बढ़िए।"

ख्वाजा साहब से फिर कुछ बोलते नहीं बना।

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चाचा नेहरू, तुम्हें प्रणाम | बाल-दिवस कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections
तुमने किया स्वदेश स्वतंत्र, फूंका देश-प्रेम का मन्त्र,


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परीक्षा - प्रेमचंद

जब रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े हुए तो परमात्मा की याद आई। जा कर महाराज से विनय की कि दीनबंधु! दास ने श्रीमान् की सेवा चालीस साल तक की,  अब मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज संभालने की शक्ति नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाए तो बुढ़ापे में दाग लगे। सारी ज़िंदगी की नेकनामी मिट्टी में मिल जाए।
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पागल हाथी  - प्रेमचन्द

मोती राजा साहब की खास सवारी का हाथी। यों तो वह बहुत सीधा और समझदार था, पर कभी-कभी उसका मिजाज गर्म हो जाता था और वह आपे में न रहता था। उस हालत में उसे किसी बात की सुधि न रहती थी, महावत का दबाव भी न मानता था। एक बार इसी पागलपन में उसने अपने महावत को मार डाला। राजा साहब ने वह खबर सुनी तो उन्हें बहुत क्रोध आया। मोती की पदवी छिन गयी। राजा साहब की सवारी से निकाल दिया गया। कुलियों की तरह उसे लकड़ियां ढोनी पड़तीं, पत्थर लादने पड़ते और शाम को वह पीपल के नीचे मोटी जंजीरों से बांध दिया जाता। रातिब बंद हो गया। उसके सामने सूखी टहनियां डाल दी जाती थीं और उन्हीं को चबाकर वह भूख की आग बुझाता। जब वह अपनी इस दशा को अपनी पहली दशा से मिलाता तो वह बहुत चंचल हो जाता। वह सोचता, कहां मैं राजा का सबसे प्यारा हाथी था और कहां आज मामूली मजदूर हूं। यह सोचकर जोर-जोर से चिंघाड़ता और उछलता। आखिर एक दिन उसे इतना जोश आया कि उसने लोहे की जंजीरें तोड़ डालीं और जंगल की तरफ भागा।
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प्यारे बच्चो | बाल कविता - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'

सुबह सवेरे उठकर बच्चो!
मात-पिता को शीश नवाओ ।
दातुन कुल्ला करके प्रतिदिन,
मुँह की बदबू दूर भगाओ ।

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नेहरू-स्मृति-गीत | बाल-दिवस कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections

जन्म-दिवस पर नेहरू चाचा, याद तुम्हारी आई।
भारत माँ के रखवारे थे, हम सब बच्चों के प्यारे थे,
दया-प्रेम मन मे धारे थे। 
बचपन प्रमुदित हुआ नेह से, जाग उठी तरुणाई।
जन्म दिवस पर नेहरू चाचा याद तुम्हारी आई।

सारी दुनिया का दुख मन में, रहे संजोए तुम जीवन में
पूजित हुए तभी जन-जन में।
दिशा दिशा में मनुज-प्रेम के धवल कीर्ति है छाई।
जन्म दिवस पर नेहरू चाचा, याद तुम्हारी आई।

तुम हर एक प्रश्न का हल थे
, बड़े सहज थे, बड़े सरल थे,
शान्ति
-दूत अविकल अविचल थे।
विश्व-वाटिका के गुलाब थे, सुरभि अलौकिक पाई।
जन्म-दिवस पर नेहरू चाचा, याद तुम्हारी आई।

यद्पि हुए तुम प्रभु को प्यारे
, किन्तु सदा ही पास हमारे,
सम्मुख हैं आदर्श तुम्हारे।
उन पर चल कर करें देश दुनिया की खूब भलाई ।
जन्म दिवस पर नेहरू चाचा, याद हम्हारी आई ।

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ज्ञान पहेलियां - मुकेश नादान 'निरूपमा'

1

रात को नभ मे चमका करता जैसे चाँदी की इक थाली
चोर  उच्चके  लूट  न  पावें  लौटे  हरदम  खाली

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पद - रैदास

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा।।

( 2 )

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ।।
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै।।
नामदेव कबीरफ़ तिलोचनु सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै।।

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दो घड़े  - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

एक घड़ा मिट्टी का बना था, दूसरा पीतल का। दोनों नदी के किनारे रखे थे। इसी समय नदी में बाढ़ आ गई, बहाव में दोनों घड़े बहते चले। बहुत समय मिट्टी के घड़े ने अपने को पीतलवाले से काफी फासले पर रखना चाहा।

पीतलवाले घड़े ने कहा, ''तुम डरो नहीं दोस्त, मैं तुम्हें धक्के न लगाऊँगा।''

मिट्टीवाले ने जवाब दिया, ''तुम जान-बूझकर मुझे धक्के न लगाओगे, सही है; मगर बहाव की वजह से हम दोनों जरूर टकराएंगे। अगर ऐसा हुआ तो तुम्हारे बचाने पर भी मैं तुम्हारे धक्कों से न बच सकूँगा और मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए अच्छा है कि हम दोनों अलग-अलग रहें।''

शिक्षा - जिससे तुम्हारा नुकसान हो रहा हो, उससे अलग ही रहना अच्छा है, चाहे वह उस समय के लिए तुम्हारा दोस्त भी क्यों न हो।

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चाचा नेहरू | बाल कविता - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'

वह मोती का लाल जवाहर,
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हार की जीत - सुदर्शन

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे 'सुल्तान' कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रूपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। "मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा", उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, "ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।" जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।
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दोहे - रहीम

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।।

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।।

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।।

चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध-नरेस।
जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत यह देस।।

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नेहरू चाचा | बाल-दिवस कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections


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हर देश में तू, हर भेष में तू - संत तुकड़ोजी

हर देश में तू, हर भेष में तू, तेरे नाम अनेक तू एकही है।
तेरी रंगभूमि यह विश्व भरा, सब खेल में, मेल में तू ही तो है।।
सागर से उठा बादल बनके, बादल से फटा जल हो करके।
फिर नहर बना नदियाँ गहरी, तेरे भिन्न प्रकार, तू एकही है।।
चींटी से भी अणु-परमाणु बना, सब जीव-जगत् का रूप लिया।
कहीं पर्वत-वृक्ष विशाल बना, सौंदर्य तेरा, तू एकही है।।
यह दिव्य दिखाया है जिसने, वह है गुरुदेव की पूर्ण दया।
तुकड़या कहे कोई न और दिखा, बस मैं अरु तू सब एकही है।।

- संत तुकड़ोजी

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छोटी-सी हमारी नदी - रवींद्रनाथ ठाकुर

छोटी-सी हमारी नदी टेढ़ी-मेढ़ी धार,
गर्मियों में घुटने भर भिगो कर जाते पार।
पार जाते ढोर-डंगर, बैलगाड़ी चालू,
ऊँचे हैं किनारे इसके, पाट इसका ढालू।
पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम,
काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम।
दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार,
रातों को हुआँ-हुआँ कर उठते सियार।
अमराई दूजे किनारे और ताड़-वन,
छाँहों-छाँहों बाम्हन टोला बसा है सघन।
कच्चे-बच्चे धार-कछारों पर उछल नहा लें,
गमछों-गमछों पानी भर-भर अंग-अंग पर ढालें।
कभी-कभी वे साँझ-सकारे निबटा कर नहाना
छोटी-छोटी मछली मारें आँचल का कर छाना।
बहुएँ लोटे-थाल माँजती रगड़-रगड़ कर रेती,
कपड़े धोतीं, घर के कामों के लिए चल देतीं।
जैसे ही आषाढ़ बरसता, भर नदिया उतराती,
मतवाली-सी छूटी चलती तेज धार दन्नाती।
वेग और कलकल के मारे उठता है कोलाहल,
गँदले जल में घिरनी-भँवरी भँवराती है चंचल।
दोनों पारों के वन-वन में मच जाता है रोला,
वर्षा के उत्सव में सारा जग उठता है टोला।

- रवींद्रनाथ ठाकुर

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बाबा आज देल छे आए - श्रीधर पाठक

बाबा आज देल छे आए,
चिज्जी पिज्जी कुछ ना लाए।
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए,
इतनी देली छे क्यों आए।
कां है मेला बला खिलौना,
कलाकंद, लड्डू का दोना।
चूं चूं गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुहिया,
चुनिया-मुनिया, मुन्ना भइया।
मेला मुन्ना, मेली गैया,
कां मेले मुन्ना की मैया।
बाबा तुम औ कां से आए,
आं आं चिज्जी क्यों ना लाए।

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बंटवारा नहीं होगा - जयप्रकाश भारती

दो भाई थे । अचानक एक दिन पिता चल बसे । भाइयों में बंटवारे की बात चली-''यह तू ले, वह मैं लूं, वह मैं लूंगा, यह तू ले ले ।'' आए दिन दोनों बैठे सूची बनाते, पर ऐसी सूची न बना सके, जो दोनों को ठीक लगे । जैसे-तैसे बंटवारे का मामला सुलझने लगा, तो एक खरल पर आकर उलझ गया । ''पिता जी अपने लिए इस खरल में दवाइयां घुटवाते थे । उसे तो मैं ही अपने पास रखूंगा ।'' बड़े ने कहा । छोटा तुनककर बोला-''यह तो कभी हो नहीं सकता । दवाइयां घोट-घोटकर तो उन्हें मैं ही देता था । उनकी निशानी के तौर पर मैं इसे रखूंगा ।''
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बाल-दिवस है आज साथियो | बाल-दिवस कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections

बाल-दिवस है आज साथियो, आओ खेलें खेल ।
जगह-जगह पर मची हुई खुशियों की रेलमपेल ।

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नाच रहा जंगल में मोर | बाल कविता - पुरुषोत्तम तिवारी

हरा सुनहरा नीला काला रंग बिरंगे बूटे वाला
चमक रहा है कितना चमचम इसका सुन्दर पंख निराला
लंबी पूंछ मुकुट धर सिर पर भीमाकार देह अति सुन्दर
कितनी प्यारी छवि वाले ये इन पर मोहित सब नारी नर

वर्षा ऋतु की जलद गर्जना सुनकर होकर भाव विभोर
नाच रहा जंगल में मोर बच्चों तुम मत करना शोर

सुनकर यह आवाज तुम्हारी तुम्हें देखकर डर जाएगा
अपने प्राणों की रक्षा में कहीं दूर यह भग जाएगा
फिर कैसे तुम देख सकोगे मनमोहक यह नृत्य मोर का
देखो कैसे देख रहा है दृश्य घूमकर सभी ओर का

नृत्य कर रहा कितना सुन्दर अपने पंखों को झकझोर
नाच रहा जंगल में मोर बच्चों तुम मत करना शोर

निर्जन शांत दूर जंगल में ये विचरण करते रहते हैं
मोर झुण्ड में एक साथ सब जंगल में उड़ते रहते हैं
पाकर मौसम मधुर सुहाना कोलाहल करने लगते हैं
अति उल्लास भरे उपवन में सुखद नृत्य करने लगते हैं

कोई भी हो समय दोपहर या हो फिर संध्या या भोर
नाच रहा जंगल में मोर बच्चों तुम मत करना शोर

मोरपंख की सुंदरता पर आकर्षित इतना मनभाया
बालकृष्ण ने इसको लेकर अपने सिर का मुकुट सजाया
इन्हें देखने से लगता है इनको लेकर पास दुलारें
कितना अच्छा हो आ जाएँ जब भी हम सब इन्हें पुकारें

ये भारत के पक्षी हमको बाँध लिए हैं प्रेम की डोर
नाच रहा जंगल में मोर बच्चों तुम मत करना शोर

- पुरुषोत्तम तिवारी "साहित्यार्थी"
  भोपाल - मध्य प्रदेश भारत
  ई-मेल: [email protected]

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दो गौरैया - भीष्म साहनी

घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं-माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।

आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!

घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँंगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गर्मी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है। मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही ‘फिर आऊँगी’ कहकर चली जाती है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं। दिन-भर ‘गुटर-गूँ, गुटर-गूँ’ का संगीत सुनाई देता रहता है। इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बर्रे भी हैं और चींटियों की तो जैसे फ़ौज ही छावनी डाले हुए है।

अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आईं थीं वैसे ही उड़ भी गईं। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है, और सामान भी ले आईं हैं और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था।

माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोलीं, "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।"

इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, "देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।"

"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ ने व्यंग्य से कहा।

माँ कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं। वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुँह से ‘श-----शू’ कहा, बाँहें झुलाईं, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाहें झुलाते, कभी ‘श---शू’ करते।

गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ ‘चीं-चीं करने लगीं। और माँ खिलखिलाकर हँसने लगीं।

पिताजी को गुस्सा आ गया, इसमें हँसने की क्या बात है?

माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है। हँसकर बोली, चिड़ियाँ एक दूसरी से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?

तब पिताजी को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया और वह पहले से भी ज्यादा ऊँचा कूदने लगे। गौरैयाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था। माँ फिर हँसने लगीं, "ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।"

"निकलेंगी कैसे नहीं?" पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरैयाँ फिर घोंसले में जा बैठी थीं। उन्होंने लाठी ऊँची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा। ‘चीं-चीं’ करती गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं।

"इतनी तकलीफ़ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते तो ये उड़ जातीं।" माँ ने हँसकर कहा।

पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाज़े पर जा बैठी। दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाज़े पर।

माँ फिर हँस दी। "तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाज़े खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाज़ा खुला छोड़ो, बाकी दरवाज़े बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।"

अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाज़े बंद कर दे!"

मैंने भागकर दोनों दरवाज़े बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाज़ा खुला रहा।

पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची। चीं-चीं करती चिड़ियाँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाज़े में से बाहर निकल गईं। माँ तालियाँ बजाने लगीं। पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।

"आज दरवाज़े बंद रखो" उन्होंने हुक्म दिया। "एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"

तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। और माँ खिलखिलाकर हँस दीं। मैंने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरैया फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं।


"दरवाज़े के नीचे से आ गई हैं," माँ बोलीं।

मैंने दरवाज़े के नीचे देखा। सचमुच दरवाज़ों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी।

पिताजी को फिर गुस्सा आ गया। माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं।

अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाज़ों के नीचे कपड़े ठूँस दिए ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए। और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिड़ियाँ चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गईं। पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं। अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।

"देखो-जी, चिड़ियों को मत निकालो" माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, "अब तो इन्होंने
अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।"

क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ? पिताजी बोले और कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूँस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं।

इतने में रात पड़ गई। हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आँगन में झाँककर देखा, चिड़ियाँ वहाँ पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी।

दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी।

अब तो रोज़ यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं।

पिताजी परेशान हो उठे। आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहें, "मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।" पर आखिर वह भी तंग आ गए थे। आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे कि वह गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे।
और वह पफ़ौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए।

घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए," उन्होंने गुस्से से कहा।

घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकाें पर जमाया और दाईं ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे।

"चलो, दो तिनके तो निकल गए," माँ हँसकर बोलीं, "अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!"

तभी मैंने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैयाँ नजर आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।

अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए, और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रूई के फाहे, और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई, "चीं-चीं, चीं-चीं!!!"

पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैयाँ लौट आईं हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा। नहीं, दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।

"चीं-चीं, चीं-चीं!" फिर आवाज आई। मैंने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरैयाँ! वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँं हैं?

मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं। और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाँफ-हाँफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं।

उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। माँ-पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।

- भीष्म साहनी

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शतरंज का जादू - गुणाकर मुले

‘शतरंज के खेल के नियमों को आप न भी जानते हों तो कम से कम इतना तो सभी जानते हैं कि शतरंज चौरस पटल पर खेला जाता है । इस पटल पर ६४ छोटे-छोटे चौकोण होते हैं।
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चुन्नी मुन्नी - हरिवंश बच्चन

मुन्नी और चुन्नी में लाग-डाट रहती है । मुन्नी छह बर्ष की है, चुन्नी पाँच की । दोनों सगी बहनें हैं । जैसी धोती मुन्नी को आये, वैसी ही चुन्नी को । जैसा गहना मुन्नी को बने, वैसा ही चुन्नी को । मुन्नी 'ब' में पढ़ती थीँ, चुन्नी 'अ' में । मुन्नी पास हो गयी, चुन्नी फ़ेल । मुन्नी ने माना था कि मैं पास हो जाऊँगी तो महाबीर स्वामी को मिठाई चढ़ाऊंगी । माँ ने उसके लिए मिठाई मँगा दी । चुन्नी ने उदास होकर धीमे से अपनी माँ से पूछा, अम्मा क्या जो फ़ेल हो जाता है वह मिठाई नहीं चढ़ाता?

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बन्दर मामा | बाल कविता - दीपक श्रीवास्तव 'नादान' | Deepak Shrivastava

बन्दर मामा बना रहे थे आम के नीचे खाना,
लदा हुआ था पेड़ आम से, उसको मिला बहाना,
खूब गिराए आम पेड़ से अब मैं बदला लूँगा,
आम के नीचे खाना इसको नहीं बनाने दूंगा,
बंदर मामा ने जैसे ही दाल में छौंक लगाया,
आम ने ऊपर से बर्तन में बड़ा सा आम गिराया,
बर्तन टूटा, मामा रूठा, रो-रो कर दिखलाया,
फ़ैल गई सब दाल, आम पर मामा को गुस्सा आया,
तब आम ने मामा को, बड़े प्यार से ये समझाया,
खूब तोड़ते आम व्यर्थ में, जब पेट भरा होता है,
व्यर्थ तोड़ने का फल मामा ऐसा ही होता है,
खूब खाओ और खिलाओ, मुझ को दु:ख न होगा,
व्यर्थ यदि फल तोड़ोगे, तो फिर ऐसा ही होगा,
बन्दर मामा कान पकड़ कर आम के आगे आया,
माफ़ करदो आम राजा, अब न ऐसा होगा,
आज से जंगल का रखवाला, बन्दर मामा होगा।

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मिठाईवाला  - भगवतीप्रसाद वाजपेयी

बहुत ही मीठे स्वरों के साथ वह गलियों में घूमता हुआ कहता - "बच्चों को बहलानेवाला, खिलौनेवाला।"
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माँ कह एक कहानी - मैथिलीशरण गुप्त

"माँ, कह एक कहानी !"

"बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी ?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी ?
कह माँ, कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी ? माँ, कह एक कहानी ।"

"तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी ।"
"जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ, यही कहानी ।"

"वर्ण-वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिन्दु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी ।"
"लहराता था पानी! हाँ, हाँ, यही कहानी ।"

"गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्ष की कानी !"
"हुई पक्ष की हानी ? करुणा-भरी कहानी !"

"चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया ।
इतने में आखेटक आया, लक्ष्य-सिद्धि का मानी ।"
"लक्ष्य-सिद्धि का मानी! कोमल-कठिन कहानी ।"

"माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी ।
तब उसने, जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी ।"
"हठ करने की ठनी! अब बढ़ चली कहानी ।"

"हुआ विवाद सदय-निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गई बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी ।"
"सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी ।"

"राहुल, तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका ?"
"माँ, मेरी क्या बानी ? मैं सुन रहा कहानी ।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य न उसे उबारे ?
रक्षक पर भक्षक को वारे न्याय दया का दानी ।"

"न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी ।"
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छोटा जादूगर - जयशंकर प्रसाद

कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूंज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहां एक लड़का चुपचाप शराब पीने वालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुँह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी सम्पन्नता थी। मैंने पूछा, ”क्यों जी, तुमने इसमें क्या देखा?”
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बारिश की मस्ती | बाल कविता - अमृता गोस्वामी

रिमझिम रिमझिम बारिश आई,
काली घटा फिर है छाई।
सड़कों पर बह उठा पानी,
कागज़ की है नाव चलानी

नुन्नू-मुन्नू-चुन्नू आए,
रंग-बिरंगे छाते लाए।
कहीं छप-छप, कहीं टप-टप,
लगती कितनी अच्छी गपशप।

रिमझिम बारिश की फौहारें
मन को भातीं खूब बौछारें,
बारिश की यह मस्ती है,
हो चाहे कल छुट्टी है।

- अमृता गोस्वामी, जयपुर

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एक तिनका  - अयोध्या सिंह उपाध्याय


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मंजुल भटनागर की बाल-कविताएं | बाल कविता - मंजुल भटनागर

दादी

चाँद की दादी
आ जा ना
ढेर खिलोने दे जा ना
दूध जलेबी ले जा ना
चाँद का कुर्ता क्यों सिलती है ?
मुझको भी बतला जा ना
कोई कहानी कह जा ना

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गिलहरी  - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'


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बादल और बारिश | बाल कविता - रवि रंजन गोस्वामी

बादल गुस्साए थे
लड़ते भिड़ते आये थे
धूम धूम धड़ाम
धूम धूम धड़ाम
बिजली चमकी बार बार
और पानी बरसा मूसलाधार
मुन्नी भागी मम्मी से चिपकी
मुन्ना भागा खिड़की बंद कर दी

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भैया-बहना | बाल कविता - अमिश भट्ट

समय से सोता राजू भैया
समय से सोती मिनी बहेना
समय से ही दोनों उठ जाते
झट पट हो तैयार हैं जाते

फिर वे जल्दी नाश्ता खाते
जिससे वे हैं पोषण पाते
फिर वे दोनों स्कूल हैं जाते
वहां बहुत सी शिक्षा पाते
स्कूल से वापस घर हैं आते
खाना खाकर खेलने जाते

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बंदर - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

देखो लड़को !  बंदर आया ।
एक मदारी उसको लाया ॥
            
             कुछ
है उसका ढंग निराला ।
             कानों में है  उसके बाला ॥

फटे पुराने रंग बिरंगे ।
कपड़े उसके
हैं बेढंगे ॥

              मुँह डरावना आँखे छोटी ।
              लंबी दुम थोड़ी सी मोटी॥

भौंह कभी वह
है मटकाता ।
आँखों को है कभी नचाता ॥

              ऐसा कभी किलकिलाता है ।
              जैसे अभी काट खाता है ॥

दाँतों को है कभी दिखाता ।
कूद फाँद है कभी मचाता ॥

              कभी घुड़कता है मुँह बा कर ।
              सब लोगों को बहुत डराकर ॥

कभी छड़ी लेकर है चलता ।
है वह यों ही कभी मचलता ॥

               है सलाम को हाथ उठाता ।
               पेट लेट कर है दिखलाता ॥

ठुमक ठुमक कर कभी नाचता ।
कभी कभी है टके माँगता ॥

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प्रकृति और मनुष्य | बाल कविता -  सय्यद अरबाज़

प्रकृति हमारी कितनी प्यारी,
सबसे अलग और सबसे न्यारी,
देती है वो सबको सीख,
समझे जो उसे नज़दीक,
पेड़,पौधे,नदी,पहाड़,
बनाए सुंदर ये संसार,
पेड़ पर लगे विभिन्न पत्ते,
सिखाते हमे रहना एक साथ,
पेड़ की ज़िंदगी जड़ों पर टिकी है,
मनुष्य की ज़िंदगी सत्कर्मों पर टिकी है,
आसमान है ये विशाल अनंत,
मनुष्य की सोंच का भी ना है अंत,
हे मनुष्य! समझो ये बातें सारी,
प्रकृति हमारी कितनी प्यारी,
सबसे अलग और सबसे न्यारी
बूँद-बूँद से बनती है नदी,
एक सोंच से बदले ये सदी,
मनुष्य करता है भेदभाव,
जाने ना प्रकृति का स्वभाव,
सबको होती है प्रकृति नसीब हो अमीर या हो ग़रीब,

मनुष्य की तरह ना परखें,
है अमीर या है ग़रीब,
पेड़ सहता है बढ़ को, लेकर पृथ्वी का सहारा,
मनुष्य सह सके बढ़ को,यदि सब खडें हो लेकर एक दूसरे का सहारा,
करे जो प्रकृति को नाश,
होता है उसका विनाश,
मनुष्य जिए और जीने दे,
मिलकर रहे सब एक साथ,
परखो भैया यह बातें सारी,
प्रकृति हमारी कितनी प्यारी,
सबसे अलग और सबसे न्यारी.
- सय्यद अरबाज़
 
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हींगवाला - सुभद्राकुमारी चौहान

लगभग 35 साल का एक खान आंगन में आकर रुक गया । हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी - ''अम्मा... हींग लोगी?''
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गिल्लू - महादेवी वर्मा

सोनजुही में आज एक पीली कली लगी है। इसे देखकर अनायास ही उस छोटे जीव का स्मरण हो आया, जो इस लता की सघन हरीतिमा में छिपकर बैठता था और फिर मेरे निकट पहुँचते ही कंधे पर कूदकर मुझे चौंका देता था। तब मुझे कली की खोज रहती थी, पर आज उस लघुप्राण की खोज है।
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मोर - जय प्रकाश भारती

उमड़ उमड़ कर बादल आते
देख-देख खुश होता मोर ।
रंग-गीले पंख खोलकर
नाच दिखाता, करता शोर ।
अपने पाँव देख लेता जब
तो बेचारा होता बोर ।

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काबुलीवाला  - रबीन्द्रनाथ टैगोर

मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह 'काक' को 'कौआ' कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है - आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग गई।
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हमसे सब कहते - निरंकार देव सेवक

नहीं सूर्य से कहता कोई
धूप यहाँ पर मत फैलाओ,
कोई नहीं चाँद से कहता
उठा चाँदनी को ले जाओ।

कोई नहीं हवा से कहता
खबरदार जो अंदर आई,
बादल से कहता कब कोई
क्यों जलधार यहाँ बरसाई?

फिर क्यों हमसे भैया कहते
यहाँ न आओ, भागो जाओ,
अम्मा कहती हैं, घर-भर में
खेल-खिलौने मत फैलाओ।

पापा कहते बाहर खेलो,
खबरदार जो अंदर आए,
हम पर ही सबका बस चलता
जो चाहे वह डाँट बताए।

- निरंकार देव सेवक

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कौन? -  सोहन लाल द्विवेदी

किसने बटन हमारे कुतरे?
किसने स्याही को बिखराया?
कौन चट कर गया दुबक कर
घर-भर में अनाज बिखराया?

दोना खाली रखा रह गया
कौन ले गया उठा मिठाई?
दो टुकड़े तसवीर हो गई
किसने रस्सी काट बहाई?

कभी कुतर जाता है चप्पल
कभी कुतर जूता है जाता,
कभी खलीता पर बन आती
अनजाने पैसा गिर जाता

किसने जिल्द काट डाली है?
बिखर गए पोथी के पन्ने।
रोज़ टाँगता धो-धोकर मैं
कौन उठा ले जाता छन्ने?

कुतर-कुतर कर कागज़ सारे
रद्दी से घर को भर जाता।
कौन कबाड़ी है जो कूड़ा
दुनिया भर का घर भर जाता?

कौन रात भर गड़बड़ करता?
हमें नहीं देता है सोने,
खुर-खुर करता इधर-उधर है
ढूँढ़ा करता छिप-छिप कोने?

रोज़ रात-भर जगता रहता
खुर-खुर इधर-उधर है धाता
बच्चों उसका नाम बताओ
कौन शरारत यह कर जाता?

- सोहन लाल द्विवेदी
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गुरु और चेला - सोहन लाल द्विवेदी

गुरु ने कहा किंतु चेला न माना,
गुरु को विवश हो पड़ा लौट जाना।
गुरुजी गए, रह गया किंतु चेला,
यही सोचता हूँगा मोटा अकेला।

चला हाट को देखने आज चेला,
तो देखा वहाँ पर अजब रेल-पेला।
टके सेर हल्दी, टके सेर जीरा,
टके सेर ककड़ी टके सेर खीरा।

टके सेर मिलती थी रबड़ी मलाई,
बहुत रोज़ उसने मलाई उड़ाई।
सुनो और आगे का फिर हाल ताज़ा।
थी अंधेर नगरी, था अनबूझ राजा।

बरसता था पानी, चमकती थी बिजली,
थी बरसात आई, दमकती थी बिजली।
गरजते थे बादल, झमकती थी बिजली,
थी बरसात गहरी, धमकती थी बिजली।

गिरी राज्य की एक दीवार भारी,
जहाँ राजा पहुँचे तुरत ले सवारी।
झपट संतरी को डपट कर बुलाया,
गिरी क्यों यह दीवार, किसने गिराया?

कहा संतरी ने-महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, ना मेरा करतब!
यह दीवार कमजोर पहले बनी थी,
इसी से गिरी, यह न मोटी घनी थी।

खता कारीगर की महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, ना मेरा करतब!
बुलाया गया, कारीगर झट वहाँ पर,
बिठाया गया, कारीगर झट वहाँ पर।

कहा राजा ने-कारीगर को सजा दो,
खता इसकी है आज इसको कज़ा दो।
कहा कारीगर ने, ज़रा की न देरी,
महाराज! इसमें खता कुछ न मेरी।

यह भिश्ती की गलती यह उसकी शरारत,
किया गारा गीला उसी की यह गफ़लत।
कहा राजा ने-जल्द भिश्ती बुलाओ।
पकड़ कर उसे जल्द फाँसी चढ़ाओ।

चला आया भिश्ती, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने-इसमें खता कुछ न मेरी।
यह गलती है जिसने मशक को बनाया,
कि ज़्यादा ही जिसमें था पानी समाया।

मशकवाला आया, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने इसमें खता कुछ न मेरी।
यह मंत्री की गलती, है मंत्री की गफ़लत,
उन्हीं की शरारत, उन्हीं की है हिकमत।

बड़े जानवर का था चमड़ा दिलाया,
चुराया न चमड़ा मशक को बनाया।
बड़ी है मशक खूब भरता है पानी,
ये गलती न मेरी, यह गलती बिरानी।

है मंत्री की गलती तो मंत्री को लाओ,
हुआ हुक्म मंत्री को फाँसी चढ़ाओ।
चले मंत्री को लेके जल्लाद फ़ौरन,
चढ़ाने को फाँसी उसी दम उसी क्षण।

मगर मंत्री था इतना दुबला दिखाता,
न गर्दन में फाँसी का फंदा था आता।
कहा राजा ने जिसकी मोटी हो गर्दन,
पकड़ कर उसे फाँसी दो तुम इसी क्षण।

चले संतरी ढूँढ़ने मोटी गर्दन,
मिला चेला खाता था हलुआ दनादन।
कहा संतरी ने चलें आप फ़ौरन,
महाराज ने भेजा न्यौता इसी क्षण।

बहुत मन में खुश हो चला आज चेला,
कहा आज न्यौता छकूँगा अकेला!!
मगर आके पहुँचा तो देखा झमेला,
वहाँ तो जुड़ा था अजब एक मेला।

यह मोटी है गर्दन, इसे तुम बढ़ाओ,
कहा राजा ने इसको फाँसी चढ़ाओ!
कहा चेले ने-कुछ खता तो बताओ,
कहा राजा ने-‘चुप’ न बकबक मचाओ।

मगर था न बुद्धू-था चालाक चेला,
मचाया बड़ा ही वहीं पर झमेला!!
कहा पहले गुरु जी के दर्शन कराओ,
मुझे बाद में चाहे फाँसी चढ़ाओ।

गुरुजी बुलाए गए झट वहाँ पर,
कि रोता था चेला खड़ा था जहाँ पर।
गुरु जी ने चेले को आकर बुलाया,
तुरत कान में मंत्र कुछ गुनगुनाया।

झगड़ने लगे फिर गुरु और चेला,
मचा उनमें धक्का बड़ा रेल-पेला।
गुरु ने कहा-फाँसी पर मैं चढूंगा,
कहा चेले ने-फाँसी पर मैं मरूँगा।

हटाए न हटते अड़े ऐसे दोनों,
छुटाए न छुटते लड़े ऐसे दोनों।
बढ़े राजा फ़ौरन कहा बात क्या है?
गुरु ने बताया करामात क्या है।

चढ़ेगा जो फाँसी महूरत है ऐसी,
न ऐसी महूरत बनी बढ़िया जैसी।
वह राजा नहीं, चक्रवर्ती बनेगा,
यह संसार का छत्र उस पर तनेगा।

कहा राजा ने बात सच गर यही
गुरु का कथन, झूठ होता नहीं है
कहा राजा ने फाँसी पर मैं चढूँगा
इसी दम फाँसी पर मैं ही टँगूँगा।

चढ़ा फाँसी राजा बजा खूब बाजा
प्रजा खुश हुई जब मरा मूर्ख राजा
बजा खूब घर-घर बधाई का बाजा।
थी अंधेर नगरी, था अनबूझ राजा

-सोहन लाल द्विवेदी
...

चिन्टू जी - प्रकाश मनु

सब पर अपना रोब जमाते
नन्हे-मुन्ने चिन्टू जी !
भैया से अब्बा कहते हैं
दीदी से करते हैं कुट्टी,
पापा से कहते हैं - मेला
दिखलाओ जी, कल है छुट्टी ।
कैसे-कैसे दांव चलाते
नन्हे-मुन्ने चिन्टू जी !
हलुआ-पूरी जी भर खाते
या फिर बरफी पिस्ते वाली,
रसगुल्ले जब आते घर में
आ जाती चेहरे पर लाली ।
धमा-चौकड़ी खूब मचाते
नन्हे-मुन्ने चिन्टू जी !
हरदम बजती पीं-पीं सीटी.
सारे दिन ही हल्ला-गुल्ला,
कोई रोके तो कहते हैं
क्या मैं बैठा रहूँ निठल्ला !
बिना बात की बात बनाते
नन्हे-मुन्ने चिन्टू जी !

...

गिलहरी का घर | बाल कविता - हरिवंशराय बच्चन

एक गिलहरी एक पेड़ पर
बना रही है अपना घर,
देख-भाल कर उसने पाया
खाली है उसका कोटर ।

...

रेल | बाल कविता - हरिवंशराय बच्चन

आओ हम सब खेलें खेल
...

खिलौनेवाला  - सुभद्रा कुमारी चौहान

वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' है
छोटे-छोटे हैं लोटा-थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
मुन्नूौ ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला कहती है
माँ se लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्याख साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है।
अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा
तोता, बिल्लीा, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।
यही रहूँगा कौशल्याऊ मैं
तुमको यही बनाऊँगा
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँ, बिना तुम्हाेरे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा?
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्यानर से बिठा गोद में,
मनचाही चींजे़ देगा।

...

हम दीवानों की क्या हस्ती - भगवतीचरण वर्मा

हम दीवानों की क्या हस्ती,
आज यहाँ कल वहाँ चले,
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले ।

आए बनकर उल्लास अभी,
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए, अरे,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले ?

किस ओर चले? मत ये पूछो,
बस चलना है, इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले,

दो बात कहीं, दो बात सुनी;
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए ।
छक कर सुख दुःख के घूँटों को,
हम एक भाव से पिए चले ।

हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर,
ले असफलता का भार चले ।

हम मान रहित, अपमान रहित,
जी भर कर खुलकर खेल चुके,
हम हँसते हँसते आज यहाँ,
प्राणों की बाज़ी हार चले ।

अब अपना और पराया क्या ?

आबाद रहें रुकने वाले !
हम स्वयं बंधे थे और स्वयं,
हम अपने बन्धन तोड़ चले ।

...

चांद का कुर्ता  - रामधारी सिंह दिनकर

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यों बोला,
"सिलवा दो माँ, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।
 
सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।
 
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो, कुर्ता ही कोई भाड़े का।"
 
बच्चे की सुन बात कहा माता ने, "अरे सलोने,
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।
 
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।
 
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।
 
घटता बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की आँखों को दिखलाई पड़ता है।
 
अब तू ही तो बता, नाप तेरा किस रोज लिवायें,
सीं दें एक झिंगोला जो हर दिन बदन में आये।"
...

फ़क़ीर का उपदेश - भारत-दर्शन संकलन

एक बार गाँव में एक बूढ़ा फ़क़ीर आया । उसने गाँव के बाहर अपना आसन जमाया । वह बड़ा होशियार फ़क़ीर था । वह लोगों को बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें बतलाता था । थोड़े ही दिनों में वह मशहूर हो गया । सभी लोग उसके पास कुछ न कुछ पूछने को पहुँचते थे । वह सबको
अच्छी सीख देता था ।
...

पारस - रोहित कुमार 'हैप्पी'

'एक बहुत गरीब आदमी था । अचानक उसे कहीं से पारस-पत्थर मिल गया। बस फिर क्या था ! वह किसी भी लोहे की वस्तु को छूकर सोना बना देता। देखते ही देखते वह बहुत धनवान बन गया ।' बूढ़ी दादी माँ अक्सर 'पारस पत्थर' वाली कहानी सुनाया करती थी । वह कब का बचपन की दहलीज लांघ कर जवानी में प्रवेश कर चुका था किंतु जब-तब किसी न किसी से पूछता रहता, "आपने पारस पत्थर देखा है?"
...

फूलों जैसे उठो खाट से | बाल गीत - क्षेत्रपाल शर्मा

फूलों जैसे उठो खाट से
बछड़ों जैसी भरो कुलांचे
अलसाये मत रहो कभी भी
थिरको एसे जग भी नांचे
नेक भावना रखो हमेशा
जियो कि जैसे चन्दा तारे
एसे रहो कि तुम सब के हो
और सभी है सगे तुम्हारे
फूलो फलो गाछ हो जैसे
बोलो बहता नीर
कांटे बनकर मत जीना तुम
हरो परायी पीर
कहना जो है सो तुम कहना
संकट से भी मत घबराना

उजियारे के लिये सलोने
झान -ज्योति का दीप जलाना
मत पडना तुम हेर फेर में
जीना जीवन सादा प्यारा
दीप सत्य है एक शस्त्र है
होगा तब हीरक उजियारा

...

काम हमारे बड़े-बड़े - चिरंजीत

हम बच्चे हैं छोटे-छोटे, काम हमारे बड़े-बड़े ।
आसमान का चाँद हमी ने
थाली बीच उतारा है,
आसमान का सतरंगा वह
बाँका धनुष हमारा है ।
आसमान के तारों में वे तीर हमारे गड़े-गड़े ।
हम बच्चे हैं छोटे-छोटे, काम हमारे बड़े-बड़े ।
भरत रूप में हमने ही तो
दांत गिने थे शेरों के,
और राम बन दांत किये थे
खट्‌टे असुर-लुटेरों के ।
कृष्ण-कन्हैया बन कर हमने नाग नथा था खड़े- खड़े ।
हम बच्चे हैं छोटे-छोटे, काम हमारे बड़े-बड़े ।।
बापू ने जब बिगुल बजाया
देश जगा, हम भी जागे,
आजादी के महायुद्ध में
हम सब थे आगे-आगे ।
इस झंडे की खातिर हमने कष्ट सहे थे कड़े-कड़े ।
हम बच्चे है छोटे-छोटे, काम हमारे बड़े-बड़े ।।
हर परेड गणतंत्र दिवस की
हम बच्चों से सजती है,
वीर बालकों. की झांकी पर
खूब तालियां बजती हैं ।
पाते जन गण मन का आशिष हाथी पर हम चढ़े-चढ़े ।
हम बच्चे हैं छोटे-छोटे, काम हमारे बड़े-बड़े ।।
...

मीठी वाणी | बाल कविता - प्रभुदयाल श्रीवास्तव

छत पर आकर बैठा कौवा,
कांव-कांव चिल्लाया ।
मुन्नी को यह स्वर ना भाया,
पत्थर मार भगाया

...

बुरा न बोलो बोल रे - आनन्द विश्वास

बुरा न देखो, बुरा सुनो ना, बुरा न बोलो बोल रे,
वाणी में मिसरी तो घोलो, बोल-बोल को तोल रे।
मानव मर जाता है लेकिन,
शब्द कभी ना मरता है।
शब्द-बाण से आहत मन का,
घाव कभी ना भरता है।
सौ-सौ बार सोच कर बोलो, बात यही अनमोल रे,
बुरा न देखो, बुरा सुनो ना, बुरा न बोलो बोल रे।

पांचाली के शब्द-बाण से,
कुरूक्षेत्र रंग लाल हुआ।
जंगल-जंगल भटके पांडव,
चीरहरण, क्या हाल हुआ।
बोल सको तो अच्छा बोलो, वर्ना मुँह मत खोल रे,
बुरा न देखो, बुरा सुनो ना, बुरा न बोलो बोल रे।

जो देखोगे और सुनोगे,
वैसा ही मन हो जायेगा।
अच्छी बातें, अच्छा दर्शन,
जीवन निर्मल हो जायेगा।
अच्छा मन, सबसे अच्छा धन, मनवा जरा टटोल रे,
बुरा न देखो, बुरा सुनो ना, बुरा न बोलो बोल रे।

...

प्रयास करो, प्रयास करो - वीर सिंह

प्रयास करो, प्रयास करो
जब तक हैं साँस प्रयास करो
जब तक हैं आस प्रयास करो
न हारो, न थको, न रुको,
बढ़ो ओर जीतने का प्रयास करो ।

...

सड़क यहीं रहती है | शेखचिल्ली के कारनामें - भारत-दर्शन संकलन

क दिन शेखचिल्ली कुछ लड़कों के साथ, अपने कस्बे के बाहर एक पुलिया पर बैठा था। तभी एक सज्जन शहर से आए और लड़कों से पूछने लगे, "क्यों भाई, शेख साहब के घर को कौन-सी सड़क गई है ?"
...

लोभी दरजी | बाल-कहानी - गिजुभाई

 
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जैसी दृष्टि - आचार्य विनोबा

रामदास रामायण लिखते जाते और शिष्यों को सुनाते जाते थे। हनुमान भी उसे गुप्त रुप से सुनने के लिए आकर बैठते थे। समर्थ रामदास ने लिखा, "हनुमान अशोक वन में गये, वहाँ उन्होंने सफेद फूल देखे।"

यह सुनते ही हनुमान झट से प्रकट हो गये और बोले, "मैंने सफेद फूल नहीं देखे थे। तुमने गलत लिखा है, उसे सुधार दो।"

समर्थ ने कहा, "मैंने ठीक ही लिखा है। तुमने सफेद फूल ही देखे थे।"

हनुमान ने कहा, "कैसी बात करते हो! मैं स्वयं वहां गया और मैं ही झूठा!"

अंत में झगड़ा रामचंद्रजी के पास पहुंचा। उन्होंने कहा, "फूल तो सफेद ही थे, परंतु हनुमान की आंखें क्रोध से लाल हो रही थीं, इसलिए वे उन्हें लाल दिखाई दिये।"

इस मधुर कथा का आशय यही है कि संसार की ओर देखने की जैसी हमारी दृष्टि होगी, संसार हमें वैसा ही दिखाई देगा।

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व्यापारी और नक़लची बंदर  - अज्ञात


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चिड़िया रानी  - डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav

सदा फुदकती, कभी न थकती,
गाती मीठी-मीठी बानी।
कैसे खुश रहती हो इतना,
सच-सच कहना चिड़िया रानी।

...

मिस्टर चूहेराम - डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav

मिस्टर चूं-चूं चूहेराम,
करते कभी न कोई काम।
बिल के पास बिछाकर घास,
दिन भर रोज खेलते तास।

...

राजा का महल | बाल-कविता  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

नहीं किसी को पता कहाँ मेरे राजा का राजमहल!
अगर जानते लोग, महल यह टिक पाता क्या एक पल?
इसकी दीवारें चाँदी की, छत सोने की धात की,
पैड़ी-पैड़ी सुंदर सीढ़ी उजले हाथी दाँत की।
इसके सतमहले कोठे पर सूयोरानी का घरबार,
सात-सात राजाओं का धन, जिनका रतन जड़ा गलहार।
महल कहाँ मेरे राजा का, तू सुन ले माँ कान में:
छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में!

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सिंह को जीवित करने वाले  - विष्णु शर्मा

किसी शहर में चार मित्र रहते थे। वे हमेशा एक साथ रहते थे। उनमें से तीन बहुत ज्ञानी थे। चौथा दोस्त इतना ज्ञानी नहीं था फिर भी वह दुनियादारी की बातें बहुत अच्छी तरह जानता था।

एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि वे दूर देश घूम-घूमकर देखेंगे और कुछ दौलत कमाकर लाएंगे। वे चारों एक साथ निकल पड़े। जल्दी ही वे एक घने जंगल में पहुँचे। रास्ते में उन्होंने किसी जानवर की हड्डियाँ ज़मीन पर खड़ी देखीं। एक ज्ञानी बोला, ‘‘हमें अपना ज्ञान परखने का मौका मिला है।’’

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