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व्यंग्य
हिंदी व्यंग्य. Hindi Satire.

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जीवन का एक सुखी दिन  - श्रीलाल शुक्ल

जीवन का एक सुखी दिन लगभग पैंतालीस साल पुरानी रचना है। उस दिन के सुखों में एक ऐसा ही सुख है जिसमें बस कंडक्टर एक रुपए का नोट लेकर पूरी की पूरी रेजगारी वापस कर देता है और टिकट की पुश्त पर ‘इकन्नी' का बकाया नहीं लिखता। जाहिर है कि यह रचना उन दिनों की है जब ‘इकन्नी' भी आदान-प्रदान में एक महत्वपूर्ण सिक्के की भूमिका निभाती थी।
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व्यंग्य चोट करता है, गुदगुदाता है | व्यंग्य  - प्रभात गोस्वामी

साहित्य ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है। मैं फक्कड़ भी हूँ, घुमक्कड़ भी हूँ। चिपकू भी हूँ और लपकू भी हूँ इसलिए साहित्य के लिए पूरी तरह फिट हूँ। प्यार में चोट खाकर कवि बना, फिर अपनी कहानी लिखने के लिए कहानीकार बन गया। बचपन से रुड़पट भी रहा सो यात्रा वृत्तान्त भी लिखे। मैं उस दौर का साहित्यकार हूँ जब संपादक बड़ी बेदर्दी से सर (रचना का) काटते थे और मैं कहता था – हुज़ूर अहिस्ता-अहिस्ता। कितनी ही रचनाएँ मेरी आलमारी में अस्वीकृति की पीड़ा से कराहती हुई उम्र क़ैद-सी त्रासदी का शिकार हुईं। कुछ ओझिया महाराज की कचौड़ियों के कागज़ को उपकृत करतीं रहीं। जहाँ लोग कचौड़ी और चाट के साथ मेरी रचनाओं को बड़े मन से चाटते रहे। क्या करें उन दिनों बड़े साहित्यकार घास नहीं डालते थे और सम्पादक दोस्ती नहीं करते थे। रचना छपे तो कैसे छपे?
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