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कलम, आज उनकी जय बोल | कविता - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
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अर्जुन उवाच - कन्हैयालाल नंदन (Kanhaiya Lal Nandan )

तुमने कहा मारो
और मैं
मारने लगा
तुम
चक्र सुदर्शन लिए बैठे ही रहे और मैं
हारने लगा !
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नहीं होता मित्र राजधानी में - जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas

मित्र
होता है हरदम
लोटे में पानी – चूल्हे में आग
जलन में झमाझम – उदासी में राग
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कृपया अर्थ दीजिये हमें - प्रीता व्यास | न्यूज़ीलैंड

शब्द हैं हम
केवल शब्द
कृपया अर्थ दीजिये हमें।
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गाँधी - सागर निज़ामी

कैसा सन्त हमारा गाँधी! कैसा सन्त हमारा!!
दुनिया थी गो उसकी बैरी, दुशमन था जग सारा।
आखिर में जब देखा साधो वो जीता जग हारा।
कैसा सन्त हमारा गाँधी! कैसा सन्त हमारा!!
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दुनिया - दीवाना रायकोटी

यह दुनिया अजब हर शै फ़ानी देखी
यहाँ हर रोज़ इक नयी कहानी देखी
जो आ के ना जाये वो बुढ़ापा देखा
जो जा के ना आये वो जवानी देखी
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दुआ - मौलाना मुहम्मद हुसैन 'आज़ाद'

आलम है अपने बिस्तरे - राहत पै ख़ाब में,
'आज़ाद' सर झुकाए ख़ुदा की जनाब में।
फैलाए हाथ सूरते- उम्मीदवार है,
औ' करता सच्चे दिल से दुआ बार बार है॥
...

विपर्यय - रंजू मिश्रा

चारदीवारी और सड़क के बीच
बच गयी है थोड़ी सी ज़मीन
मिट्टी की एक पतली सी पट्टी
पट्टी से सटे दीवार पर
बड़े यत्न से रखे हुए हैं कुछ गमले
जिनमें लगे हुए हैं
लोक-लुभावन, गुण-गंध-रसहीन
कुछ ब्रांडेड फूल और
विदेशी नस्ल के लम्बे-लम्बे पत्ते
जिसे नाजों से सींचते रहते हैं
उस घर के मालिक ।
पाइप से छिटके हुए पानी से
अनायास ही भीगती रहती है
दीवार के किनारे की वह मिट्टी
उसी छिटके हुए छींटों के भरोसे
...

रत्न-करण - श्रीनाथ सिंह

जलाती जिसे क्रोध की आग,
धर्म का उसको बन्धन व्यर्थ
न सीखा जिसने करना त्याग,
प्रेम का वह क्या जाने अर्थ
रहा जिस पर आलस्य सवार,
मनुज वह जीवित मृतक समान।
लोभ ही है जिसका व्यापार,
बराबर उसे मान अपमान॥
...

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