रोहित कुमार 'हैप्पी' की ग़ज़लें एक ऐसी भी घड़ी आती है अब यहाँ कैसे रोशनी होती हो लिखी जिनके मुकद्दर में खिजां ना कोई रूत ना भाये है मौसम एक अर्से से खुद में खोए हो .................................
कच्चा-पक्का मकान था अपना अपना तुमको समझ लिया हमने वो भी गैरों-सी बात करने लगे है पीपल ना पेड़ बेरी का इससे आगे तो रास्ता ही नहीं .................................
वक्त के साथ तो हर शख्स बदलता है मगर आर या पार कोई एक बात कह दो हमें फूल रस्ते में उनके जब से लगे हैं बिछने वही गली, वही मोहल्ला और अपना शहर .................................
ना हमको दिया कुछ ना हमसे ले गए उनको स्वाद आया ना आया नहीं पता लगता है आप आये यहां मुदद्तों के बाद मिलने की ख्वाहिशें तो दोनों ही ओर थी
Rohit Kumar 'Happy' is Auckland, New Zealand based Hindi journalist, Hindi poet and Hindi writer from New Zealand who is the editor and publisher of Hindi magazine, 'Bharat-Darshan.' |

