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दरिंदा

दरिंदा
आदमी की आवाज़ में
बोला

स्वागत में मैंने
अपना दरवाज़ा
खोला

और दरवाज़ा
खोलते ही समझा
कि देर हो गई

मानवता
थोडी बहुत जितनी भी थी
ढेर हो गई !

- भवानीप्रसाद मिश्र

 

 

 

रोहित कुमार 'हैप्पी' की ग़ज़लें

 

ग़ज़ल

एक ऐसी भी घड़ी आती है
जिस्म से रूह बिछुड़ जाती है

अब यहाँ कैसे रोशनी होती
ना कोई दीया, ना बाती है

हो लिखी जिनके मुकद्दर में खिजां
कोई रितु उन्हें ना भाती है

ना कोई रूत ना भाये है मौसम
चांदनी रात दिल दुखाती है

एक अर्से से खुद में खोए हो
याद किसकी तुम्हें सताती है

 

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

कच्चा-पक्का मकान था अपना
फिर भी कुछ तो निशान था अपना

अपना तुमको समझ लिया हमने
तुम भी लेते समझ हमें अपना

वो भी गैरों‍-सी बात करने लगे
जिनके होंठों पे नाम था अपना

है पीपल ना पेड़ बेरी का
ये शहर है, वो गांव था अपना

इससे आगे तो रास्ता ही नहीं
शायद ये ही मुकाम था अपना

 

 

 

 

 

 

ग़ज़ल

वक्त के साथ तो हर शख्स बदलता है मगर
मर्द कहलाते जमाने को बदल देते अगर

आर या पार कोई एक बात कह दो हमें
आपकी अच्छी नहीं लगती हमें अगर-मगर

फूल रस्ते में उनके जब से लगे हैं बिछने
मुश्किल लगती है उन्हें तब से मेरे घर की डगर

वही गली, वही मोहल्ला और अपना शहर
जिन्हें पहचानता दिखते नहीं वे चेहरे मगर

 

 

 

 

 

ग़ज़ल

ना हमको दिया कुछ ना हमसे ले गए
खाली हाथ आए खाली चले गए

उनको स्वाद आया ना आया नहीं पता
मुर्गे अपनी जान से बेशक चले गए

लगता है आप आये यहां मुदद्तों के बाद
जिन्हें पूछते हो वो तो कब के चले गए

मिलने की ख्वाहिशें तो दोनों ही ओर थी
हां हम इधर आये पर वो उधर चले गए

 

 

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