ग़ज़ल उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन मैंने काँधे पे `कुँअर' हँस के बिठाया था जिसे - कुँअर बेचैन |

