ग़ज़ल दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियाँ जब हो सकी न बात तो हमने यही किया अब भी किसी दराज में मिल जाएँगे तुम्हें - कुँअर बेचैन
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ग़ज़ल दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियाँ जब हो सकी न बात तो हमने यही किया अब भी किसी दराज में मिल जाएँगे तुम्हें - कुँअर बेचैन
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