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कब लोगे अवतार हमारी धरती पर (काव्य) 
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रचनाकार: रोहित कुमार 'हैप्पी'

फैला है अंधकार हमारी धरती पर
हर जन है लाचार हमारी धरती पर
हे देव! धरा है पूछ रही...
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

तुम तो कहते थे धर्म की हानि होगी जब-जब
हर लोगे तुम पाप धरा के आओगे तुम तब-तब
जरा सुनों कि त्राहि-त्राहि चारों ओर से होती है
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

सीता झेल रही संताप
रोके रुके नहीं है पाप
हानि धर्म की होती है
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

द्रोपदी कलयुग में लाचार
तुम्हें क्यों सुनती नहीं पुकार
दुर्योधन मुँह बिचकाता है
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

दुर्योधन लाख सिरों वाला
टलता नहीं टले टाला
दुर्योधन हमें चिढ़ाता है
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

यहाँ रावण राज लगा चलने
मिलकर विभीषण-रावण से
श्रीराम को रोज सताता है
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

अब आ जाओ हरि जल्दी से
प्रभु देर ना करना गलती से
जग आँख लगाए बैठा है
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

यहां रंग नहीं हैं होली के
नित खून बहे है गोली से
मन व्याकुल तुम्हें ध्याता है
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

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