जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

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आज की होली  (काव्य)

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Author: ललितकुमारसिंह 'नटवर'

अजी! आज होली है आओ सभी।
रंगो ख़ुद भी, सब को रंगाओ सभी॥

बिना रँग में बोरे, किसी को न छोड़ो;
ख़ुशी मन से गावो बजावो सभी।

यही आज अवसर है, आपस में मिल कर;
हृदय की बुराई नशाओ सभी।

नहीं भिन्नता दोस्त दुश्मन में मानो;
गले एक एक को,  लगाओ सभी।

पिओ प्रेम-प्याला, नशा इस तरह हो;
झूमो ख़ुद भी, सब को झुमावो सभी।

बहुत दिन पर आयी है होली हमारी;
हृदय की तपन को बुझावों सभी।
अजी! आज होली है आओ सभी।
रंगो ख़ुद भी, सब को रंगाओ सभी॥

- ललितकुमारसिंह 'नटवर'

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