| काव्य |
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| जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है। |
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अब तो हरि नाम लौ लागी | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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साजन! होली आई है!
- फणीश्वरनाथ रेणु | Phanishwar Nath 'Renu'
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साजन! होली आई है! सुख से हँसना जी भर गाना मस्ती से मन को बहलाना पर्व हो गया आज- साजन ! होली आई है! हँसाने हमको आई है! साजन! होली आई है! इसी बहाने क्षण भर गा लें दुखमय जीवन को बहला लें ले मस्ती की आग- साजन! होली आई है! जलाने जग को आई है! साजन! होली आई है! रंग उड़ाती मधु बरसाती कण-कण में यौवन बिखराती, ऋतु वसंत का राज- लेकर होली आई है! जिलाने हमको आई है! साजन ! होली आई है! खूनी और बर्बर लड़कर-मरकर- मधकर नर-शोणित का सागर पा न सका है आज- सुधा वह हमने पाई है ! साजन! होली आई है! साजन ! होली आई है ! यौवन की जय ! जीवन की लय! गूँज रहा है मोहक मधुमय उड़ते रंग-गुलाल मस्ती जग में छाई है साजन! होली आई है!
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संत दादू दयाल के पद
- संत दादू दयाल | Sant Dadu Dayal
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पूजे पाहन पानी
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अर्जुन की प्रतिज्ञा
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा, मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा। मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ, प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ? युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से, अब रोष के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से । निश्चय अरुणिमा-मित्त अनल की जल उठी वह ज्वाल सी, तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही। साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं, पूरा करुंगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं। जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी, वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी। अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है, इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है, उस खल जयद्रथ को जगत में मृत्यु ही अब सार है, उन्मुक्त बस उसके लिये रौ'र'व नरक का द्वार है। उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दंड है, पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचंड है । अतएव कल उस नीच को रण-मध्य जो मारूँ न मैं, तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं। अथवा अधिक कहना वृथा है, पार्थ का प्रण है यही, साक्षी रहे सुन ये वचन रवि, शशि, अनल, अंबर, मही। सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वध करूँ, तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ। |
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गुणगान
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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कलम, आज उनकी जय बोल | कविता
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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जो अगणित लघु दीप हमारे, तूफ़ानों में एक किनारे, जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन, मांगा नहीं स्नेह मुँह खोल। कलम, आज उनकी जय बोल। पीकर जिनकी लाल शिखाएं, उगल रही सौ लपट दिशाएं, जिनके सिंहनाद से सहमी, धरती रही अभी तक डोल। कलम, आज उनकी जय बोल। अंधा चकाचौंध का मारा, क्या जाने इतिहास बेचारा, साखी हैं उनकी महिमा के, सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल। कलम, आज उनकी जय बोल। |
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वीर | कविता
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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जो तुम आ जाते एक बार | कविता
- महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma
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कितनी करूणा कितने संदेश पथ में बिछ जाते बन पराग गाता प्राणों का तार तार अनुराग भरा उन्माद राग आँसू लेते वे पथ पखार जो तुम आ जाते एक बार
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अधिकार | कविता
- महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma
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वे मुस्काते फूल, नहीं जिनको आता है मुर्झाना, वे तारों के दीप, नहीं जिनको भाता है बुझ जाना।
वे नीलम के मेघ, नहीं जिनको है घुल जाने की चाह, वह अनन्त रितुराज, नहीं जिसने देखी जाने की राह।
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मैं नीर भरी दुःख की बदली | कविता
- महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma
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मैं नीर भरी दुःख की बदली, स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनो में दीपक से जलते, पलकों में निर्झनी मचली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली ! मेरा पग पग संगीत भरा, श्वांसों में स्वप्न पराग झरा, नभ के नव रंग बुनते दुकूल, छाया में मलय बयार पली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली ! मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल, चिंता का भर बनी अविरल, रज कण पर जल कण हो बरसी, नव जीवन अंकुर बन निकली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली ! पथ न मलिन करते आना पद चिन्ह न दे जाते आना सुधि मेरे आगम की जग में सुख की सिहरन हो अंत खिली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली ! विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना परिचय इतना इतिहास यही उमटी कल थी मिट आज चली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली !
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संत दादू दयाल के पद
- संत दादू दयाल | Sant Dadu Dayal
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पूजे पाहन पानी
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जलियाँवाला बाग में बसंत
- सुभद्रा कुमारी चौहान
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यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते, काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
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कबीर दोहे -2
- कबीरदास | Kabirdas
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(21) लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट । पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥
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रहीम के दोहे
- रहीम
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| (1)
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रहीम के दोहे - 2
- रहीम
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| (21)
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काका हाथरसी का हास्य काव्य
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार
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वंदन कर भारत माता का | काका हाथरसी की हास्य कविता
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय । काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय ॥
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हास्य दोहे | काका हाथरसी
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज, ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज
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खिलौनेवाला
- सुभद्रा कुमारी चौहान
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वह देखो माँ आज खिलौनेवाला फिर से आया है। कई तरह के सुंदर-सुंदर नए खिलौने लाया है। हरा-हरा तोता पिंजड़े में गेंद एक पैसे वाली छोटी सी मोटर गाड़ी है सर-सर-सर चलने वाली। सीटी भी है कई तरह की कई तरह के सुंदर खेल चाभी भर देने से भक-भक करती चलने वाली रेल। गुड़िया भी है बहुत भली-सी पहने कानों में बाली छोटा-सा \\\'टी सेट\\\' है छोटे-छोटे हैं लोटा-थाली। छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं हैं छोटी-छोटी तलवार नए खिलौने ले लो भैया ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार। मुन्नूौ ने गुड़िया ले ली है मोहन ने मोटर गाड़ी मचल-मचल सरला कहती है माँ se लेने को साड़ी कभी खिलौनेवाला भी माँ क्याख साड़ी ले आता है। साड़ी तो वह कपड़े वाला कभी-कभी दे जाता है। अम्मा तुमने तो लाकर के मुझे दे दिए पैसे चार कौन खिलौने लेता हूँ मैं तुम भी मन में करो विचार। तुम सोचोगी मैं ले लूँगा तोता, बिल्लीा, मोटर, रेल पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा ये तो हैं बच्चों के खेल। मैं तो तलवार ख़रीदूँगा माँ या मैं लूँगा तीर-कमान जंगल में जा, किसी ताड़का को मारुँगा राम समान। तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों- को मैं मार भगाऊँगा यों ही कुछ दिन करते-करते रामचंद्र मैं बन जाऊँगा। यही रहूँगा कौशल्याऊ मैं तुमको यही बनाऊँगा तुम कह दोगी वन जाने को हँसते-हँसते जाऊँगा। पर माँ, बिना तुम्हाेरे वन में मैं कैसे रह पाऊँगा? दिन भर घूमूँगा जंगल में लौट कहाँ पर आऊँगा। किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा तो कौन मना लेगा कौन प्यानर से बिठा गोद में, मनचाही चींजे़ देगा। |
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मेरा शीश नवा दो - गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है | ग़ज़ल
- वसीम बरेलवी
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ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है समन्दरों ही के लहजे में बात करता है ख़ुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है ज़मीं की कैसी विक़ालत हो फिर नहीं चलती जब आसमां से कोई फ़ैसला उतरता है तुम आ गये हो तो फिर चाँदनी सी बातें हों ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है
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माँ कह एक कहानी
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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"माँ कह एक कहानी।" बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?" "कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी? माँ कह एक कहानी।" "तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे, तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।" "जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।" वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे, हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।" "लहराता था पानी, हाँ हाँ यही कहानी।" "गाते थे खग कल कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से, गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्षी की हानी।" "हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!" चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया, इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।" "लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।" "माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी, तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।" "हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।" हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में, गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सब ने जानी।" "सुनी सब ने जानी! व्यापक हुई कहानी।" राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?" "माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी। कोई निरपराध को मारे तो क्यों न उसे उबारे? रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।" "न्याय दया का दानी! तूने गुणी कहानी।"
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राम रतन धन पायो | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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कबीर के दोहे
- कबीरदास | Kabirdas
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| कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं। हम कबीर के अधिक से अधिक दोहों को संकलित करने हेतु प्रयासरत हैं।
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फागुन के दिन चार
- मीराबाई | Meerabai
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| फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
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कबीर वाणी
- कबीरदास | Kabirdas
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माला फेरत जुग गया फिरा ना मन का फेर कर का मनका छोड़ दे मन का मन का फेर मन का मनका फेर ध्रुव ने फेरी माला धरे चतुरभुज रूप मिला हरि मुरली वाला कहते दास कबीर माला प्रलाद ने फेरी धर नरसिंह का रूप बचाया अपना चेरो
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कबीर की हिंदी ग़ज़ल
- कबीरदास | Kabirdas
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| क्या कबीर हिंदी के पहले ग़ज़लकार थे? यदि कबीर की निम्न रचना को देखें तो कबीर ने निसंदेह ग़ज़ल कहीं है:
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कबीर भजन
- कबीरदास | Kabirdas
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उमरिया धोखे में खोये दियो रे। धोखे में खोये दियो रे। पांच बरस का भोला-भाला बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश विदेश गयो। उमर सब .... चालिस बरस अन्त अब लागे, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पुत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो। लड़का बहुरी बोलन लागे, बूढ़ा मर न गयो।। बरस साठ-सत्तर के भीतर, केश सफेद भयो। वात पित कफ घेर लियो है, नैनन निर बहो। न हरि भक्ति न साधो की संगत, न शुभ कर्म कियो। कहै कबीर सुनो भाई साधो, चोला छुट गयो।।
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बिहारी के होली दोहे
- बिहारी | Bihari
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होली पर बिहारी के कुछ दोहे
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बहुत वासनाओं पर मन से | गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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बहुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर, तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर । संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
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हरि बिन कछू न सुहावै | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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नर हो न निराश करो मन को
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ काम करो जग में रहके निज नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को । संभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलम्बन को नर हो न निराश करो मन को । जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठके अमरत्व विधान करो दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन को । निज गौरव का नित ज्ञान रहे हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे सब जाय अभी पर मान रहे मरणोत्तर गुंजित गान रहे कुछ हो न तजो निज साधन को नर हो न निराश करो मन को ।
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झूठी जगमग जोति | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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कबीर दोहे -4
- कबीरदास | Kabirdas
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अब तो मेरा राम | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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म्हारे तो गिरधर गोपाल | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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म्हारे तो गिरधर गोपाल म्हारे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥ जाके सिर मोर मुगट मेरो पति सोई। तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥ छाँडि दई कुद्दकि कानि कहा करिहै कोई॥ संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥ चुनरीके किये टूक ओढ लीन्हीं लोई। मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥ अंसुवन जू सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई। अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥ भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई। दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
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रंग भरी राग | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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यक्ष प्रश्न - अटल बिहारी वाजपेयी की कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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राग होरी सिन्दूरा | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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पंद्रह अगस्त की पुकार
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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कर्मवीर
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
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देख कर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले । आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं । जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए । व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर गर्जते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।
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एक बूँद | Ek Boond
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
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एक बूँद
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी। सोचने फिर-फिर यही जी में लगी, आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?
देव मेरे भाग्य में क्या है बदा, मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ? या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी, चू पडूँगी या कमल के फूल में ?
बह गयी उस काल एक ऐसी हवा वह समुन्दर ओर आई अनमनी। एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।
लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें बूँद लौं कुछ और ही देता है कर ।
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध |
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सूर के पद | Sur Ke Pad
- सूरदास | Surdas
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मन न भए दस-बीस - सूरदास के पद
- सूरदास | Surdas
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| मन न भए दस-बीस
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हरि संग खेलति हैं सब फाग - सूरदास के पद
- सूरदास | Surdas
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हरि संग खेलति हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।। सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन। बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।। डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग। अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।। एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि। छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।। मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई। भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नाईं।। छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि। सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।। दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद। सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद।।
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झाँसी की रानी
- सुभद्रा कुमारी चौहान
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सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
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सुखी आदमी
- केदारनाथ सिंह | Kedarnath Singh
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आज वह रोया यह सोचते हुए कि रोना कितना हास्यास्पद है वह रोया मौसम अच्छा था धूप खिली हुई सब ठीक-ठाक सब दुरुस्त बस खिड़की खोलते ही सलाखों से दिख गया ज़रा-सा आसमान और वह रोया फूटकर नहीं जैसे जानवर रोता है माँद में वह रोया।
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तुलसी की चौपाइयां
- तुलसीदास | Tulsidas
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किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनूरूप।। जथा अनेक वेष धरि नृत्य करइ नट कोइ । सोइ सोइ भाव दिखावअइ आपनु होइ न सोइ ।।
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स्वतंत्रता का दीपक
- गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
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कवि की बरसगाँठ
- गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
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उन्तीस वसन्त जवानी के, बचपन की आँखों में बीते झर रहे नयन के निर्झर, पर जीवन घट रीते के रीते
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मेरा धन है स्वाधीन कलम
- गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
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राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम जिसने तलवार शिवा को दी रोशनी उधार दिवा को दी पतवार थमा दी लहरों को ख़ंजर की धार हवा को दी अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम रस-गंगा लहरा देती है मस्ती-ध्वज फहरा देती है चालीस करोड़ों की भोली किस्मत पर पहरा देती है संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम कोई जनता को क्या लूटे कोई दुखियों पर क्या टूटे कोई भी लाख प्रचार करे सच्चा बनकर झूठे-झूठे अनमोल सत्य का रत्नहार, लाती चोरों से छीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम बस मेरे पास हृदय-भर है यह भी जग को न्योछावर है लिखता हूँ तो मेरे आगे सारा ब्रह्मांड विषय-भर है रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम लिखता हूँ अपनी मरज़ी से बचता हूँ क़ैंची-दर्ज़ी से आदत न रही कुछ लिखने की निंदा-वंदन ख़ुदग़र्ज़ी से कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम तुझ-सा लहरों में बह लेता तो मैं भी सत्ता गह लेता ईमान बेचता चलता तो मैं भी महलों में रह लेता हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम |
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गोपालदास नीरज के गीत | जलाओ दीये | Neeraj Ke Geet
- गोपालदास ‘नीरज’
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जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए । नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल, उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले, लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी, निशा की गली में तिमिर राह भूले, खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग, उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए। जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में, कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी, मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी, कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी, चलेगा सदा नाश का खेल यों ही, भले ही दिवाली यहाँ रोज आए। जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए । मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में, नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा, उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के, नहीं कर सकेंगे हृदय में उजारा, कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए। जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। |
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अब तो मजहब कोई | नीरज के गीत
- गोपालदास ‘नीरज’
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अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए
आग बहती है यहाँ, गंगा में, झेलम में भी कोई बतलाए, कहाँ जाकर नहाया जाए
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जितना कम सामान रहेगा | नीरज का गीत
- गोपालदास ‘नीरज’
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जितना कम सामान रहेगा उतना सफ़र आसान रहेगा
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तुम दीवाली बनकर
- गोपालदास ‘नीरज’
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तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो, मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊँगा!
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गोपालदास नीरज के दोहे
- गोपालदास ‘नीरज’
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(1) कवियों की और चोर की गति है एक समान दिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान
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रैदास के पद
- रैदास | Ravidas
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अब कैसे छूटे राम रट लागी। प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥ प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥ प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥ प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥ प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै 'रैदासा'॥ |
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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ग़ज़ल
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bhartandu Harishchandra
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मीरा के पद - Meera Ke Pad
- मीराबाई | Meerabai
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| दरद न जाण्यां कोय
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मीरा के पद - Meera Ke Pad
- मीराबाई | Meerabai
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अब तो हरि नाम लौ लागी
सब जग को यह माखनचोर, नाम धर्यो बैरागी। कहं छोडी वह मोहन मुरली, कहं छोडि सब गोपी। मूंड मुंडाई डोरी कहं बांधी, माथे मोहन टोपी। मातु जसुमति माखन कारन, बांध्यो जाको पांव। स्याम किशोर भये नव गोरा, चैतन्य तांको नांव। पीताम्बर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै। दास भक्त की दासी मीरा, रसना कृष्ण रटे॥
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मीरा के होली पद
- मीराबाई | Meerabai
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| फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
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दोहे | रसखान के दोहे
- रसखान | Raskhan
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प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ। जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥
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रसखान की पदावलियाँ | Raskhan Padawali
- रसखान | Raskhan
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मानुस हौं तो वही रसखान बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन। जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥ या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं। आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥ रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं। कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥ सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै। जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥ नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं। ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥ |
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रसखान के फाग सवैय्ये
- रसखान | Raskhan
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रसखान के फाग सवैय्ये
मिली खेलत फाग बढयो अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै। कर कुंकुम लै करि कंजमुखि प्रिय के दृग लावन को धमकैं।। रसखानि गुलाल की धुंधर में ब्रजबालन की दुति यौं दमकै। मनौ सावन सांझ ललाई के मांझ चहुं दिस तें चपला चमकै।।
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एक ऐसी भी घड़ी आती है / ग़ज़ल
- रोहित कुमार 'हैप्पी' | Rohit Kumar 'Happy'
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एक ऐसी भी घड़ी आती है जिस्म से रूह बिछुड़ जाती है
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मुट्ठी भर रंग अम्बर में
- रोहित कुमार 'हैप्पी' | Rohit Kumar 'Happy'
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मुट्ठी भर रंग अम्बर में किसने है दे मारा आज तिरंगा दीखता है अम्बर मोहे सारा
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बिहारी के दोहे | Bihari's Couplets
- बिहारी | Bihari
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रीति काल के कवियों में बिहारी सर्वोपरि माने जाते हैं। सतसई बिहारी की प्रमुख रचना हैं। इसमें 713 दोहे हैं। बिहारी के दोहों के संबंध में किसी ने कहा हैः सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर।।
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उसे यह फ़िक्र है हरदम
- भगत सिंह
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काका हाथरस्सी का हास्य काव्य
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार
बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर जहाँ 'मूड' आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना
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डा रामनिवास मानव के दोहे
- डा रामनिवास मानव
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| डॉ. 'मानव' दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। उनके कुछ दोहे यहां दिए जा रहे हैं:
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गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| यहाँ हम रवीन्द्रनाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) की सुप्रसिद्ध रचना 'गीतांजलि'' को श्रृँखला के रूप में प्रकाशित करने जा रहे हैं। 'गीतांजलि' गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941) की सर्वाधिक प्रशंसित रचना है। 'गीतांजलि' पर उन्हें 1910 में नोबेल पुरस्कार भी मिला था। |
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दिन अँधेरा-मेघ झरते | रवीन्द्रनाथ ठाकुर
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| यहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना "मेघदूत' के आठवें पद का हिंदी भावानुवाद (अनुवादक केदारनाथ अग्रवाल) दे रहे हैं। देखने में आया है कि कुछ लोगो ने इसे केदारनाथ अग्रवाल की रचना के रूप में प्रकाशित किया है लेकिन केदारनाथ अग्रवाल जी ने स्वयं अपनी पुस्तक 'देश-देश की कविताएँ' के पृष्ठ 215 पर नीचे इस विषय में टिप्पणी दी है।
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चल तू अकेला! | रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला! तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला, जब सबके मुंह पे पाश.. ओरे ओरे ओ अभागी! सबके मुंह पे पाश, हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय! तब भी तू दिल खोलके, अरे! जोश में आकर, मनका गाना गूंज तू अकेला! जब हर कोई वापस जाय.. ओरे ओरे ओ अभागी! हर कोई बापस जाय.. कानन-कूचकी बेला पर सब कोने में छिप जाय...
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प्यार भरी बोली | होली हास्य कविता
- जैमिनी हरियाणवी | Jaimini Hariyanavi
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होली पर हास्य-कवि जैमिनी हरियाणवी की कविता
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पुष्प की अभिलाषा | माखनलाल चतुर्वेदी की कविता
- माखनलाल चतुर्वेदी
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चाह नहीं मैं सुरबाला के, गहनों में गूँथा जाऊँ,
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मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर, अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं, कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?
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दिन जल्दी-जल्दी ढलता है
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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हो जाय न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं - यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है! दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
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एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए, कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए, इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े, और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए! किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा। एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
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मरण काले
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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निराला के देहांत के पश्चात् उनके मृत शरीर का चित्र देखने पर हरिवंशराय बच्चन की लिखी कविता - मरा मैंने गरुड़ देखा, गगन का अभिमान, धराशायी,धूलि धूसर, म्लान! मरा मैंने सिंह देखा, दिग्दिगंत दहाड़ जिसकी गूँजती थी, एक झाड़ी में पड़ा चिर-मूक, दाढ़ी-दाढ़-चिपका थूक। मरा मैंने सर्प देखा, स्फूर्ति का प्रतिरूप लहरिल, पड़ा भू पर बना सीधी और निश्चल रेख। मरे मानव-सा कभी मैं दीन, हीन, मलीन, अस्तंगमितमहिमा, कहीं, कुछ भी नहीं पाया देख। क्या नहीं है मरण जीवन पर अवार प्रहार? - कुछ नहीं प्रतिकार। क्या नहीं है मरण जीवन का महा अपमान?- सहन में ही त्राण। क्या नहीं है मरण ऐसा शत्रु जिसके साथ, कितना ही सम कर, निबल निज को मान, सबको, सदा, करनी पड़ी उसकी शरण अंगीकार?- क्या इसी के लिए मैंने नित्य गाए गीत, अंतर में सँजोए प्रीति के अंगार, दी दुर्नीति को डटकर चुनौती, ग़लत जीती बाज़ियों से मैं बराबर हार ही करता गया स्वीकार, एक श्रद्धा के भरोसे न्याय, करुणा, प्रेम - सबके लिए निर्भर एक ही अज्ञात पर मैं रहा सहता बुद्धि व्यंग्य प्रहार? इस तरह रह अगर जीवन का जिया कुछ अर्थ, मरण में मैं मत लगूँ असमर्थ!
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बाकी बच गया अंडा | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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पाँच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गये चार चार पूत भारत माता के, चारों चतुर-प्रवीन देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन तीन पूत भारत माता के, लड़ने लग गए वो अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच बच गए दो दो बेटे भारत माता के, छोड़ पुरानी टेक चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया है एक एक पूत भारत माता का, कंधे पर है झंडा पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाक़ी बच गया अंडा
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लोगे मोल? | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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लोगे मोल? लोगे मोल? यहाँ नहीं लज्जा का योग भीख माँगने का है रोग पेट बेचते हैं हम लोग लोगे मोल? लोगे मोल?
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भिक्षुक | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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वह आता - दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
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प्राप्ति | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका, हवा बन बहीं तुम, जब मैं थका, रुका । मुझे भर लिया तुमने गोद में, कितने चुम्बन दिये, मेरे मानव-मनोविनोद में नैसर्गिकता लिये; सूखे श्रम-सीकर वे छबि के निर्झर झरे नयनों से, शक्त शिराएँ हुईं रक्त-वाह ले, मिलीं - तुम मिलीं, अन्तर कह उठा जब थका, रुका । |
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तोड़ती पत्थर | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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वसन्त आया
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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सखि, वसन्त आया । भरा हर्ष वन के मन, नवोत्कर्ष छाया। किसलय-वसना नव-वय-लतिका मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका, मधुप-वृन्द बन्दी- पिक-स्वर नभ सरसाया। लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर बही पवन बन्द मन्द मन्दतर, जागी नयनों में वन- यौवन की माया। आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे, केशर के केश कली के छुटे, स्वर्ण-शस्य-अञ्चल पृथ्वी का लहराया।
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ध्वनि
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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अभी न होगा मेरा अंत अभी-अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसंत- अभी न होगा मेरा अंत।
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फूल और काँटा | Phool Aur Kanta
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
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हैं जनम लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता। रात में उन पर चमकता चांद भी, एक ही सी चांदनी है डालता।।
मेह उन पर है बरसता एक-सा, एक-सी उन पर हवाएं हैं बहीं। पर सदा ही यह दिखाता है हमें, ढंग उनके एक-से होते नहीं।।
छेद कर कांटा किसी की उंगलियां, फाड़ देता है किसी का वर वसन। प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर, भौंरें का है बेध देता श्याम तन।।
फूल लेकर तितलियों को गोद में, भौंरें को अपना अनूठा रस पिला। निज सुगंधों औ निराले रंग से, है सदा देता कली जी की खिला।। |
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ओ शासक नेहरु सावधान
- वंशीधर शुक्ल
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ओ शासक नेहरु सावधान पलटो नौकरशाही विधान अन्यथा पलट देगा तुमको मजदूर, वीर योद्धा, किसान |
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जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है | ग़ज़ल
- डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
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जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है यह सवेरा भी क्या सवेरा है
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बचकर रहना इस दुनिया के लोगों की परछाई से
- विजय कुमार सिंघल
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बचकर रहना इस दुनिया के लोगों की परछाई से इस दुनिया के लोग बना लेते हैं परबत राई से।
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साँप!
- अज्ञेय | Agyeya
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तुम सभ्य तो हुए नहीं नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। एक बात पूछूँ- (उत्तर दोगे?) तब कैसे सीखा डँसना- विष कहाँ पाया? |
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जो पुल बनाएँगें
- अज्ञेय | Agyeya
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होली की रात | Jaishankar Prasad Holi Night Poetry
- जयशंकर प्रसाद | Jaishankar Prasad
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बरसते हो तारों के फूल छिपे तुम नील पटी में कौन? उड़ रही है सौरभ की धूल कोकिला कैसे रहती मीन।
चाँदनी धुली हुई हैं आज बिछलते है तितली के पंख। सम्हलकर, मिलकर बजते साज मधुर उठती हैं तान असंख।
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महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति
- केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal
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महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति कवि! वह कविता जिसे छोड़ कर चले गए तुम, अब वह सरिता काट रही है प्रान्त-प्रान्त की दुर्दम कुण्ठा--जड़ मति-कारा मुक्त देश के नवोन्मेष के जनमानस की होकर धारा। काल जहाँ तक प्रवहमान है और जहाँ तक दिक-प्रमान है गए जहाँ तक वाल्मीकि हैं गए जहाँ तक कालिदास हैं वहाँ-दूर तक प्रवहमान है आँसू-आह-गीत की धारा तुमने जिसको आयुदान दी और जिसका रूप सँवारा। आज तुम्हारा जन्म-दिवस है कवि, यह भारत चिरकृतज्ञ है।
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आज भी खड़ी वो...
- सपना सिंह ( सोनश्री )
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निराला की कविता, 'तोड़ती पत्थर' को सपना सिंह (सोनश्री) आज के परिवेश में कुछ इस तरह से देखती हैं:
आज भी खड़ी वो...
तोडती पत्थर,
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छवि नहीं बनती
- सपना सिंह ( सोनश्री )
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निराला पर सपना सिंह (सोनश्री) की कविता
निराला जी, निराले थे ।
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बहुत वासनाओं पर मन से - गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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बहुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर, तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर । संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
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