आप अपने कार्यक्रमों द्वारा अंधविश्वास भी दूर कर रहे हैं। सुनते हैं आप अंधविश्वास नहीं करते और भूत-प्रेत, ग्रह-दिशा इत्यादि में भी आपका अधिक विश्वास नहीं?
नहीं, हम इसमें विश्वास रखते ही नहीं। भूत-प्रेत, दिशाओं का चक्कर, ग्रहों का चक्कर और हमारे यहाँ समाज में धर्म के नाम पर जो अँधविश्वास किसी भी रूप में प्रचलित है हम उसका प्रखर विरोध इसलिए करते हैं कि अँधविश्वास हमारे धर्म के हिस्से कभी रहे ही नहीं। ये तो कुछ तथाकथित स्वार्थी लोगों ने धर्म के भीतर इन चीजो को जोड़ा हुआ है जिससे उनकी स्वार्थसिद्वि होती रहे। और धर्म के नाम से लोगों की श्रध्दा का और उनकी भावनाओं का, संवेदनाओं का शोषण होता रहे।
क्या आपको ऐसा आभास है कि भारत से बाहर बसे हुए भारतीय भारतीयता को अधिक अपनाते हैं, भारतीयता के प्रति अधिक आकर्षित हैं और योग एवं अध्यात्म में गहरी रूचि रखते हैं।
पहली बात तो यह है कि भारत में बसे हुए भारतीयों में भी योग के प्रति अभिरूचि हमने जगाई है। जहाँ तक बाहर के लोगों की बात है जब व्यक्ति को जो चीज नहीं मिलती उसकी भूख उसको जागती है। भारत से बाहर बसे भारतीयों को भारत की परम्पराएं, भारत की मर्यादाएं, भारत के नियम और भारत की व्यवस्थाएं और भारत का अध्यात्म इसलिए उनको रूचिकर लगता है क्योंकि उनको वो अध्यात्मिक परिवेश, वो साँसकृतिक परिवेश उनको वहाँ नहीं मिलता। इन सबके न मिलने से इनकी महत्ता उनको समझ आती है और वो लोग फिर उस चीज को महत्व देने लग जाते है। हमारे यहाँ धर्म सहज सुलभ है इसलिए धर्म को हम बहुत ध्यान नहीं दे पाते।
भारत जैसी महार्षियों और देव भूमि पर इतने भ्रष्टाचार फैलने का आप क्या कारण समझते हैं?
देखिए, सब चीजे हमारे विचारों और संकल्प से जुडी हुई हैं। जब हमारा संकल्प पवित्र होता है तब सब कुछ सही हो जाता है। योग के साथ-साथ हम देश को इन मुद्दों से भी जोड़ते हैं कि हमारे देश में भ्रष्ट राजनेता, भ्रष्ट अधिकारी, रिश्वतखोर इन सब लोगों का एक तरह से सफाया होना चाहिए और यह देश दोबारा से अपनी प्राचीन साँस्कृतिक पहचान को – सत्य, अहिंसा, ईमानदारी और इंसानियत इन मूल्यों को दुबारा अपनाये। मैं ऐसा समझता हूँ कि भारत में अच्छे लोग बहुत ज्यादा हैं और थोड़े लोग हैं जो भ्रष्ट हैं। थोड़े से भ्रष्ट लोगों के कारण से देश को भ्रष्ट कहना ठीक नहीं होगा। इसलिए बेहतर है कि हम उन थोड़े से भ्रष्ट लोगों का बहिष्कार करके समाज में ऐसे मूल्यों की स्थापना करें जिससे कि उन लोगों का अपमान हो। वे अपमानित हों और अवमानित हों। तो फिर यह देश आज भी महान है, कल भी महान था और कल और महान ही बनेगा।
भारत से बाहर बसे भारतीयों को आप योगा और अध्यात्म का क्या संदेश देना चाहेंगे?
एक तो योग बोलो। योग जो है हमारी भारतीय सँस्कृति का शब्द है। योगा कहने से हमारी भारतीय मूल का अपभ्रंश हो जाता है।
भारत से बाहर बसे भारतीयों के लिए यही संदेश है कि भारत की माटी जहाँ सबसे पहले सूर्य उदय होता है, भारत की वह माटी जहाँ भगवानों ने भी अवतार लिए भारत की यह पवित्र गँगा और यह हिमालय मायने भारत की जो भी हमारी साँस्कृतिक धरोहर हैं और जो भी भगवान ने इस भारत पर इतनी कृपा की कि आज दुनिया की बडी हस्तियां भी कहती हैं कि हमारा जन्म भारतभूमि में होना चाहिए। भारत माता को बाहर बसे भारतीयों को भी नहीं भूलना चाहिए। भारत माता से मतलब भारत की परम्पराएं, भारत की आस्थाएं, भारत का अध्यात्म, भारत की मर्यादाएं। उन सब चीजों को हमें याद रखना चाहिए। और इसी का नाम भारत है।
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