स्वतंत्रता दिवस पर विशेष
रामप्रसाद बिस्मिल का अंतिम पत्र
शहीद होने से एक दिन पूर्व रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने एक मित्र को निम्न पत्र लिखा -
"19 तारीख को जो कुछ होगा मैं उसके लिए सहर्ष तैयार हूँ।
आत्मा अमर है जो मनुष्य की तरह वस्त्र धारण किया करती है।"
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यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?
जिस देश में बचपन भूखा है
जहाँ रोज जवानी बिकती है
जहाँ भीख बुढ़ापा मांगे है
यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?
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दिशा और दशा
मुझे भारत में आए हुए कई महीने हो गए थे और अब तो वापिस न्यूजीलैड लौटने का समय हो गया था।
अरे भई, तुम्हारी सब ख़रीदारी कर लाई हूँ, लो पकड़ो ये किताबें।' बडी दीदी ने सामान मुझे थमाते हुए कहा, 'अरे हाँ, बस वो भारत माता वाली तस्वीर जो तुमने कही थी, कहीं नहीं मिली। तुम अगर बाज़ार जाओ तो खुद ही देख लेना।
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दूसरा रूख
चित्रकार दोस्त ने भेंट स्वरूप एक तस्वीर दी। आवरण हटा कर देखा तो निहायत ख़ुशी हुई। तस्वीर भारत माता की थी। माँ-सी सुंदर, भोली सूरत, अधरों पर मुसकान कंठ में सुशोभित आभूषण, मस्तक को और ऊँचा करता हुआ मुकुट व हाथ में तिरंगा।
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भारत का स्वाधीनता यज्ञ और हिन्दी काव्य
"हिमालय के ऑंगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार।"
“जगे हम लगे जगाने विश्व, देश में फिर फैला आलोक,
व्योम तम पुंज हुआ तब नष्ट, अखिल संस्कृति हो उठी अशोक।”
परिवर्तन की जीवंत प्रक्रिया सतत् प्रवहमान है। संहार के बाद सृजन, क्रांति के बाद शांति और संघर्ष के बाद विमर्श का सिलसिला मानव के अन्तर्वाह्य जगत में चलता रहता है।
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निम्न, 'कविता' 'मेरी भारत-माता' भारत से एक नोवीं कक्षा के छात्र, 'आकाश सेठी'
ने प्रकाशनार्थ भेजी है जिसे हम मूल रूप (असंपादित) में ही प्रकाशित क्र रहे हैं।
मेरी भारत माता
सबसे प्यारी भारत माता
इसका झंडा ऊँचा लहराता।
यह देश सबका राज दुलारा
प्राणों से भी हमको प्यारा।।
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